प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Pm Narendra Modi के लाल किले से दिए गए ‘दिमागी नक्सली’ Dimagi Naxali Se Savdhan वाले बयान के बाद अब शिक्षा और छात्र आंदोलनों को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच पत्रकार दीपक चौरसिया Deepak Chaurasia ने सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को लेकर तीखे सवाल खड़े किए हैं। परिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया ने शिक्षा सुधार के नाम पर कॉकरोच जनता पार्टी के सलेक्लिव अपरोच को लेकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने अभिजीत दीपके, सौरव दास औऱ आशुतोष रांका सक्रिय भूमिका और झारखंड के छात्रों के मुद्दों पर को लेकर सवाल उठाया है।
दीपक चौरसिया का सवाल है कि अगर शिक्षा सुधार और छात्रों का भविष्य किसी आंदोलन के केंद्र में है, तो झारखंड के छात्रों की जमीनी समस्याओं को भी उतनी ही गंभीरता से क्यों नहीं उठाया जा रहा है। उनका निशाना खास तौर पर उन दावों पर है, जिनमें शिक्षा सुधार और छात्र हित को आंदोलन का मुख्य उद्देश्य बताया जाता है। सवाल उठ रहे हैं कि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार होने के चलते कॉकरोच जनता पार्टी उन्हें बैकअप देने की कोशिश कर रहे हैं.
शिक्षा सुधार पर सवाल, रांची के छात्रों की सुध कब?
झारखंड में छात्र शिक्षा, परीक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर लंबे समय से अपनी आवाज उठाते रहे हैं। ऐसे में दीपक चौरसिया ने सवाल खड़ा किया है कि छात्र हित की राजनीति करने वाले संगठनों को रांची पहुंचकर छात्रों की वास्तविक समस्याएं सुननी चाहिए या नहीं।?
उनकी टिप्पणी का केंद्रीय सवाल यही है कि शिक्षा सुधार केवल बयान और सोशल मीडिया अभियान तक सीमित रहेगा या फिर जमीन पर भी दिखाई देगा?
अगर किसी संगठन का दावा है कि वह छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ रहा है, तो उससे यह भी पूछा जाना स्वाभाविक है कि उसने कितने छात्रों से सीधे संवाद किया, उनकी समस्याओं को सरकार के सामने किस रूप में रखा और अब तक उसका क्या परिणाम सामने आया ? बशर्ते सरकार किसी की भी हो.
सरकार ने मांगें मानीं तो आंदोलन का आधार क्या?
विवाद का एक दूसरा पहलू आंदोलन से जुड़े नेताओं के उन दावों को लेकर है, जिनमें सरकार द्वारा उनकी अधिकांश मांगें स्वीकार किए जाने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कई मांगें मान ली गई हैं, तो बाकी मांगों की स्थिति क्या है और छात्रों को उसका लाभ कब तक मिलेगा?
यही वह बिंदु है जिस पर दीपक चौरसिया ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शिक्षा सुधार की राजनीति करने वालों को अपने दावों और जमीनी काम का हिसाब भी जनता के सामने रखना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ बयान के बाद बहस और तीखी
हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव आजमा रहे हैं। इन्हें पहचानकर आइसोलेट करने के साथ ही देश की युवा पीढ़ी को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा से जोड़ना होगा। pic.twitter.com/C8ynOwYHoy
— Narendra Modi (@narendramodi) August 15, 2026
प्रधानमंत्री मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान ने इस बहस को एक नया राजनीतिक संदर्भ दे दिया है। हालांकि, किसी संगठन या व्यक्ति को ‘नक्सली’ या ‘दिमागी नक्सली’ कहना गंभीर आरोप है और इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। अगर प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले से कहा है तो उनके पास इसके पूरे सबूत होंगे कि देश के अंदर अर्बन नक्सल किस तरह से अपना काम कर रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया ने भी उसी दिमागी नक्सल का अपने पोस्ट में जिक्र किया है. ऐसे में अब असली सवाल ये है कि छात्र आंदोलनों की राजनीति शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार जैसे मुद्दों के बीच सलेक्टिव अपरोच के साथ काम करी है. जो कुछ राजनेओं को बैकअप सपोर्ट दे रही है.
अब जवाब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से
दीपक चौरसिया के सवालों के बाद निगाहें अब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के जवाब पर हैं। संगठन यदि शिक्षा सुधार को अपना मुख्य एजेंडा बताता है, तो वह यह स्पष्ट कर सकता है कि झारखंड के छात्रों के लिए उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं और सरकार से उसकी किन मांगों पर सहमति बनी है।
आखिर शिक्षा सुधार का अंतिम लाभ राजनीतिक संगठनों को नहीं, छात्रों को मिलना चाहिए। इसलिए बहस बयानबाजी से आगे बढ़कर स्कूलों, शिक्षकों, परीक्षाओं और छात्रों की वास्तविक समस्याओं के समाधान तक पहुंचनी चाहिए।
फिलहाल दीपक चौरसिया के सवाल ने एक नई बहस जरूर छेड़ दी है-शिक्षा सुधार की राजनीति में झारखंड के छात्रों की आवाज सबसे ऊपर है या राजनीतिक एजेंडा?
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