SIR पर सियासी संग्राम तेज: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और चुनाव आयोग की कथित आपत्तियों से बढ़ी हलचल

देश में मतदाता सूची के SIR ( Special Intensive Revision ) यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस लगातार गहराती जा रही है। एक तरफ चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को अधिक सटीक और अपडेट करने की कवायद बता रहा है, वहीं विपक्षी दल प्रक्रिया के तौर-तरीकों, दस्तावेजों और संभावित तौर पर नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

इस बीच दिल्ली में SIR के तहत जारी किए गए ‘logical discrepancy’ नोटिसों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और चुनाव आयोग के भीतर कुछ मुद्दों पर कथित असहमति की रिपोर्ट ने पूरे मामले को और चर्चा में ला दिया है।

दिल्ली में SIR नोटिसों पर सुप्रीम कोर्ट की नजर

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को ‘logical discrepancy’ के आधार पर नोटिस दिए गए हैं। इसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

22 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि कुछ नोटिस पहली नजर में ‘mechanically’ यानी बिना पर्याप्त व्यक्तिगत जांच के जारी किए गए प्रतीत होते हैं।

अदालत ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि मतदाताओं को नोटिस भेजने से पहले इस्तेमाल किए गए मानदंड और जांच की प्रक्रिया क्या थी।

रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली में लाखों मतदाताओं को अलग-अलग आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं। ऐसे में अदालत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि यदि किसी मतदाता को रिकॉर्ड में विसंगति के आधार पर नोटिस मिलता है तो उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।

चुनाव आयोग की ओर से अदालत में यह आश्वासन दिया गया है कि उचित प्रक्रिया और सुनवाई के बिना किसी पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाया नहीं जाएगा।

चुनाव आयोग के अंदर भी उठे सवाल?

SIR को लेकर एक अन्य रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को भी बहस के केंद्र में ला दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों के दौरान आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, Form 6, मतदाता डेटा तथा SIR से जुड़े कुछ निर्णयों से जोड़ा गया है।

हालांकि, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग की ओर से अलग स्पष्टीकरण दिया गया। आयोग के सूत्रों ने कहा कि SIR सहित आयोग के फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सहमति से लिए गए हैं।

इस तरह एक तरफ रिपोर्टों में कुछ मुद्दों पर आंतरिक आपत्तियों का उल्लेख है, जबकि आयोग का आधिकारिक पक्ष अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत बताता है।

कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल

SIR को लेकर कांग्रेस लगातार चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर सवाल उठा रही है।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने SIR की आलोचना करते हुए इसे ‘Shah Instigated Removal’ तक कहा है। उनका आरोप है कि प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को अपने नाम बचाने के लिए नोटिस और दस्तावेजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है।

विपक्ष की मुख्य चिंता यह है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में कहीं ऐसा न हो कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम भी किसी दस्तावेजी कमी, तकनीकी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी समस्या के कारण प्रभावित हो जाएं।

सरकार और चुनाव आयोग का तर्क

दूसरी ओर सरकार और चुनाव आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करना जरूरी है।

SIR के जरिए मृत मतदाताओं, डुप्लीकेट प्रविष्टियों, स्थान बदल चुके मतदाताओं और अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करने का प्रयास किया जाता है। साथ ही पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया भी इसका हिस्सा है।

चुनाव आयोग का मूल तर्क है कि मतदाता सूची में पात्र मतदाता मौजूद हों और अपात्र या गलत प्रविष्टियां हटाई जाएं, ताकि चुनावी प्रक्रिया में मतदाता सूची अधिक सटीक रहे।

विवाद का सबसे अहम बिंदु क्या है?

SIR को लेकर मौजूदा विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ यह नहीं है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण होना चाहिए या नहीं।

असल सवाल प्रक्रिया को लेकर है।

यदि किसी मतदाता के रिकॉर्ड में कोई विसंगति सामने आती है और उसे नोटिस भेजा जाता है, तो उसे यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि समस्या क्या है, कौन से दस्तावेज जरूरी हैं और अपना पक्ष रखने की प्रक्रिया क्या होगी।

इसी वजह से SIR की बहस अब मतदाता सूची के शुद्धीकरण बनाम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के बीच संतुलन के सवाल तक पहुंच गई है।

विपक्षी दलों की आपत्तियां भी तेज

SIR को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की भूमिका और प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाए हैं।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव समेत विपक्ष के कई नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

वहीं आयोग की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत की जा रही है और अंतिम फैसले आयोग की संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।

इसलिए मौजूदा विवाद में विपक्ष के आरोप, मीडिया रिपोर्टों में सामने आई जानकारी और चुनाव आयोग के आधिकारिक स्पष्टीकरण को अलग-अलग संदर्भ में देखना जरूरी है।

आगे क्या होगा?

अब SIR को लेकर आने वाले दिनों में कई घटनाक्रम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का अगला रुख:

दिल्ली में ‘logical discrepancy’ नोटिसों को लेकर अदालत चुनाव आयोग के जवाब के आधार पर आगे की दिशा तय कर सकती है।

नोटिस और दस्तावेजों की प्रक्रिया:

यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग मतदाताओं के लिए नोटिस और जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया को किस तरह और अधिक स्पष्ट बनाता है।

दावे और आपत्तियों का निपटारा:

SIR की प्रक्रिया में दावे और आपत्तियां दाखिल होने के बाद कितने नाम बरकरार रहते हैं, कितने नए नाम जुड़ते हैं और कितनी प्रविष्टियां अपात्र पाई जाती हैं-यह भी महत्वपूर्ण आंकड़ा होगा।

SIR पर सबसे बड़ा सवाल

मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि इस प्रक्रिया के दौरान किसी वास्तविक मतदाता का नाम केवल तकनीकी गलती, दस्तावेजी कमी या गलत पहचान के कारण प्रभावित न हो।

इसलिए SIR को लेकर मौजूदा बहस का केंद्र अब यही सवाल बन गया है

मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने के साथ क्या ऐसी व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा रही है, जिसमें हर पात्र मतदाता को पर्याप्त सूचना, जवाब देने का अवसर और प्रभावी सुनवाई मिल सके?

SIR को लेकर आगे आने वाले न्यायिक निर्देश, चुनाव आयोग की प्रक्रिया और राज्यों से सामने आने वाले आंकड़े इस पूरे विवाद की अगली तस्वीर तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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