Rahul Gandhi vs Manusmriti : कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 22 अगस्त 2026 को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में मनुस्मृति को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता के संदर्भ में मनुस्मृति की आलोचना करते हुए कहा कि महिलाओं को पिता, पति या पुत्र के अधीन रखने वाली सोच शर्मनाक है। उन्होंने इसे पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था से जोड़ते हुए छात्राओं से ऐसी रूढ़ सोच को तोड़ने का आह्वान किया।
राहुल गांधी का यह बयान राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। लेकिन इस बहस में एक ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है-अगर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को मनुस्मृति के संदर्भ में उद्धृत किया जा रहा है, तो क्या उनके पूरे विचार पढ़े जा रहे हैं? यहीं से इतिहास थोड़ा जटिल हो जाता है।
आंबेडकर मनुस्मृति के कटु आलोचक थे। 1927 में महाड आंदोलन के दौरान मनुस्मृति-दहन उनके सामाजिक संघर्ष के इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक बना। लेकिन यही पूरी कहानी नहीं है। बाद के वर्षों में आंबेडकर ने स्वयं मनु और अन्य स्मृतिकारों के कुछ प्रावधानों का उल्लेख किया और 1949 में हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान मनु तथा याज्ञवल्क्य के संदर्भ में पुत्री के संपत्ति अधिकार की चर्चा की।
इसलिए यह कहना कि “आंबेडकर मनुस्मृति के प्रशंसक थे” उतना ही सरलीकरण है, जितना यह कहना कि “आंबेडकर ने मनुस्मृति का हर संदर्भ केवल नकारने के लिए दिया।”
असल बात इससे अधिक महत्वपूर्ण है।
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आंबेडकर ने मनुस्मृति की आलोचना क्यों की?
आंबेडकर का सबसे बड़ा संघर्ष जाति, अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता के खिलाफ था। उनके लिए किसी ग्रंथ का मूल्य इस बात से तय होता था कि उसके सामाजिक प्रभाव क्या हैं और वह मनुष्य की समानता के साथ खड़ा है या नहीं।
आंबेडकर के शुरुआती महत्वपूर्ण लेख ‘Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development’ में भी मनु और जाति व्यवस्था पर चर्चा मिलती है। उन्होंने मनु को जाति का आविष्कारक मानने के बजाय यह तर्क दिया कि जाति उनसे पहले मौजूद थी और मनु ने मौजूदा जाति-नियमों को व्यवस्थित और दार्शनिक आधार देने का काम किया। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। आंबेडकर के अनुसार समस्या सिर्फ एक व्यक्ति ‘मनु’ नहीं थे। समस्या वह सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें जन्म के आधार पर मनुष्य की स्थिति तय होती थी।
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1927 का मनुस्मृति-दहन क्या बताता है?
25 दिसंबर 1927 को महाड में मनुस्मृति-दहन हुआ। सरकारी संकलन Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 17 में उस समय की प्रतिक्रिया और आंबेडकर की स्थिति का उल्लेख मिलता है। इसमें प्रकाशित समकालीन विवरण के अनुसार आंबेडकर ने मनुस्मृति के दहन का बचाव इस आधार पर किया कि उनके मत में वह अस्पृश्यों पर लंबे समय से चले आ रहे उत्पीड़न को धार्मिक-कानूनी आधार देती थी। इसलिए यह दावा करना कठिन है कि आंबेडकर मनुस्मृति को एक आदर्श सामाजिक संविधान मानते थे। उनका संघर्ष उस व्यवस्था के विरुद्ध था जिसे वे जातिगत असमानता और अस्पृश्यता को वैधता देने वाली परंपरा के रूप में देखते थे।
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फिर “आंबेडकर मनुस्मृति के प्रशंसक भी थे” वाली बात कहां से आती है?
यहीं इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। आंबेडकर ने प्राचीन भारतीय कानून और धर्मशास्त्रों को पढ़ा, उनका उद्धरण दिया और उनके भीतर मौजूद विभिन्न नियमों की तुलना की। इसका अर्थ यह नहीं था कि वे उस ग्रंथ के हर सिद्धांत को स्वीकार करते थे। 1949 में हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान उनका रुख इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने मनु और याज्ञवल्क्य का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों स्मृतिकारों के यहां पुत्री के लिए पिता की संपत्ति में एक-चौथाई हिस्से का प्रावधान बताया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि बाद की प्रथा ने इस प्रावधान की प्रभावशीलता को खत्म कर दिया था। और इसके बाद आंबेडकर जिस दिशा में गए, वह और महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदू कोड बिल के जरिए बेटी को बेटे के बराबर अधिकार देने की दिशा में कदम बढ़ाया।
अर्थात् उन्होंने पुराने ग्रंथ के उस हिस्से को तर्क के रूप में इस्तेमाल किया जिसे वे अपने सुधारवादी उद्देश्य के अनुकूल पाते थे, लेकिन आधुनिक कानून में उससे आगे जाकर समानता स्थापित करने की कोशिश की। इसे “मनुस्मृति की प्रशंसा” कहना अधूरा निष्कर्ष है।
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आंबेडकर का तर्क था- परंपरा से संवाद करो, लेकिन समानता को सर्वोच्च रखो
आंबेडकर का दृष्टिकोण केवल “पुराना इसलिए गलत” या “पुराना इसलिए सही” वाला नहीं था। वे पुराने कानूनों और स्मृतियों को पढ़ते थे, उनमें मौजूद विरोधाभासों को सामने रखते थे और फिर आधुनिक समाज के लिए क्या स्वीकार्य होना चाहिए, यह तय करते थे। 1949 की बहस में उनका तर्क यही दिखाता है। उन्होंने कहा कि यदि प्राचीन स्मृतियों में बेटी के लिए संपत्ति का हिस्सा स्वीकार किया गया था, तो आधुनिक कानून द्वारा बेटी को बेटे के बराबर अधिकार देना केवल परंपरा से पूरी तरह विच्छेद नहीं है, बल्कि उसे आगे बढ़ाने वाला सुधार भी माना जा सकता है। यही कारण है कि आंबेडकर को केवल “मनुस्मृति विरोधी” टैग में सीमित कर देना उनके बौद्धिक काम को छोटा कर देता है।
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लेकिन महिलाओं की स्वतंत्रता पर मनुस्मृति में क्या लिखा है?
राहुल गांधी ने जिस विषय को उठाया, उसमें भी तथ्य और संदर्भ दोनों जरूरी हैं। मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 3 में कहा गया है कि बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र महिला की रक्षा करें तथा महिला को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसी तरह अध्याय 5 के श्लोक 145-146 में भी महिला के जीवन के अलग-अलग चरणों में पिता, पति और पुत्र के अधीन रहने की बात आती है। इसलिए राहुल गांधी के बयान का यह हिस्सा कि मनुस्मृति में महिला की स्वतंत्रता को सीमित करने वाले प्रावधान हैं, पूरी तरह काल्पनिक दावा नहीं है। मूल पाठ में ऐसे श्लोक मौजूद हैं। लेकिन दूसरी तरफ मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान की बात करने वाला प्रसिद्ध श्लोक भी है।
अध्याय 3, श्लोक 56 में कहा गया है:
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”
अर्थात जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति को केवल एक-दो वायरल श्लोकों से समझना भी सही पद्धति नहीं है। ग्रंथ में अलग-अलग प्रसंगों और सामाजिक भूमिकाओं से जुड़े अनेक नियम हैं, जिनमें आधुनिक समानता की कसौटी पर कई प्रावधानों पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
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यहां आंबेडकर से क्या सीखना चाहिए?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक है। आंबेडकर ने किसी ग्रंथ को केवल राजनीतिक नारे के आधार पर नहीं पढ़ा। उन्होंने मूल ग्रंथ, सामाजिक व्यवहार, इतिहास और कानून—इन सबको साथ रखकर देखा। इसलिए राहुल गांधी हों या उनके आलोचक- दोनों के लिए आंबेडकर को पढ़ने का सही तरीका यही है कि उनके पूरे विचारों को देखा जाए।
आंबेडकर से पांच बड़ी सीख
पहली-मूल स्रोत पढ़िए
मनुस्मृति पर बहस सोशल मीडिया के छोटे-छोटे उद्धरणों से नहीं हो सकती। मूल श्लोक और उसका संदर्भ देखना जरूरी है।
दूसरी-एक ग्रंथ को एक ही रंग में मत रंगिए
किसी ग्रंथ में मौजूद परस्पर अलग-अलग प्रकार के प्रावधानों को समझना जरूरी है।
तीसरी-आंबेडकर ने आलोचना के साथ अध्ययन भी किया
वे मनुस्मृति के आलोचक थे, लेकिन उन्होंने उसे पढ़ा, उद्धृत किया और उसके प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया।
चौथी-परंपरा और आधुनिक कानून में अंतर समझिए
आंबेडकर का अंतिम लक्ष्य आधुनिक भारत में समान नागरिक अधिकार और सामाजिक न्याय था। भारत सरकार के डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन के अनुसार भी आंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और अधिकारों को अपने संवैधानिक चिंतन के केंद्र में रखा।
पांचवीं-आंबेडकर को राजनीतिक खांचे में बंद मत कीजिए
उन्हें केवल कांग्रेस, भाजपा, दलित राजनीति या किसी एक वैचारिक खेमे के चश्मे से पढ़ना उनके विचारों को सीमित करना है।
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तो क्या आंबेडकर मनुस्मृति के आलोचक और प्रशंसक दोनों थे?
सटीक उत्तर है-उन्हें “प्रशंसक” कहना उचित नहीं है। आंबेडकर ने मनुस्मृति और उससे जुड़े सामाजिक सिद्धांतों की तीखी आलोचना की। जाति और अस्पृश्यता के संदर्भ में उनका विरोध स्पष्ट था और 1927 का मनुस्मृति-दहन उनके आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक बना।
लेकिन उन्होंने बाद में मनु को ऐतिहासिक-कानूनी स्रोत के रूप में उद्धृत किया और कुछ प्रावधानों-विशेषकर उत्तराधिकार के संदर्भ में-का इस्तेमाल अपने सुधारवादी तर्क में किया। 1949 की हिंदू कोड बिल बहस इसका स्पष्ट उदाहरण है।
> आंबेडकर मनुस्मृति के सामाजिक सिद्धांतों के आलोचक थे, लेकिन वे उसके ऐतिहासिक और कानूनी संदर्भों का अध्ययन करने से पीछे नहीं हटे। यह अंतर बहुत बड़ा है।
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राहुल गांधी के लिए आंबेडकर का सबसे बड़ा सबक क्या है?
अगर मनुस्मृति पर बहस करनी है तो आंबेडकर से सबसे बड़ी सीख यही हो सकती है कि नारे से ज्यादा जरूरी अध्ययन है। महिलाओं की स्वतंत्रता, जाति और सामाजिक समानता पर आधुनिक भारत का संविधान सर्वोच्च कानूनी आधार है। आंबेडकर ने जिस संविधान की रचना में निर्णायक भूमिका निभाई, उसमें समानता, गरिमा और स्वतंत्रता के सिद्धांत केंद्रीय हैं। भारत सरकार की आधिकारिक जीवनी भी उनके सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों पर जोर को रेखांकित करती है।इसलिए आज की राजनीतिक बहस में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कोई व्यक्ति “मनुस्मृति के पक्ष में” है या “मनुस्मृति के खिलाफ”।
सवाल यह होना चाहिए कि आज के भारत में कौन-से विचार संविधान की समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के सिद्धांतों के अनुरूप हैं?
आंबेडकर का रास्ता यही था-इतिहास को पढ़ना, तर्क करना, परंपरा की जांच करना और अंततः मनुष्य की स्वतंत्रता व समानता को केंद्र में रखना। यही वह बात है जिसे मनुस्मृति पर किसी भी राजनीतिक बहस से पहले समझना जरूरी है।
मनुस्मृति और आंबेडकर के संबंध को केवल “आंबेडकर ने किताब जलाई थी” बनाम “आंबेडकर ने मनु की प्रशंसा की थी” जैसे दो नारों में बांटना इतिहास के साथ न्याय नहीं करता।
एक तरफ 1927 का मनुस्मृति-दहन है, दूसरी तरफ 1949 की हिंदू कोड बिल बहस में मनु और याज्ञवल्क्य का संदर्भ। दोनों को साथ पढ़ने पर आंबेडकर की कार्यपद्धति सामने आती है-आलोचनात्मक अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की जांच और आधुनिक समानता के लक्ष्य के लिए कानून में सुधार। इसलिए राहुल गांधी को बाबा साहब से यदि कुछ सीखना है, तो वह केवल मनुस्मृति की आलोचना नहीं, बल्कि मनुस्मृति को पढ़ने की आंबेडकर वाली आलोचनात्मक पद्धति भी है। और यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।