Manusmriti Explained: ‘मनुस्मृति’ को लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी समेत वामपंथी दल और विपक्ष के कई राजनीतिक पार्टियों आपत्ति दर्ज कराती आई हैं. इसे लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ब्राह्मण समाज की भी एक वर्ग द्वारा घेराबंदी की जाती रही है. लेकिन आज हम Journalist india की इस रिपोर्ट में समझेंगे आखिर मनुस्मृति क्या है, इसका सच क्या है, उससे जुड़े भ्रम क्या हैं?
‘मनुस्मृति’ को आम तौर पर Manu-smṛti या ‘मानव-धर्मशास्त्र’ कहा जाता है। यह धर्मशास्त्र परंपरा का एक संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें धर्म, सामाजिक आचार, राजा और न्याय व्यवस्था, दंड, विवाह, उत्तराधिकार, वर्ण-व्यवस्था, कर्म और प्रायश्चित जैसे विषयों पर नियम और विचार मिलते हैं। Cambridge University Press के अध्ययन में भी इसे ‘मानव-धर्मशास्त्र’ परंपरा के महत्वपूर्ण नीतिशास्त्र या अर्थशास्त्र के रूप में रखा गया है।
यहीं से पहला बड़ा भ्रम दूर होता है।
मनुस्मृति को सीधे-सीधे “हिंदुओं की एकमात्र धार्मिक किताब” कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। हिंदू परंपरा में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, पुराण, आगम और अनेक स्मृतियां एवं धर्मशास्त्र मौजूद रहे हैं। हिंदू विधि और आचार परंपरा भी केवल मनुस्मृति पर आधारित नहीं रही।
जुलाई 2026 में भारत के Solicitor General तुषार मेहता ने भी कहा कि हिंदू कानून को मनुस्मृति से जोड़ना एक misconception यानी ग़लतफ़हमी है और ऐतिहासिक हिंदू विधि परंपरा में अलग-अलग school of law रहे हैं।
तो क्या हर हिंदू के घर में मनुस्मृति होती है?
नहीं। ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे कहा जा सके कि मनुस्मृति हर हिंदू परिवार में रखी या पढ़ी जाती है। आम हिंदू परिवारों में धार्मिक जीवन का आधार अलग-अलग परंपराओं के अनुसार बदलता है। पूजा-पाठ में रामायण, गीता, हनुमान चालीसा, पुराण, क्षेत्रीय ग्रंथ या गुरु-परंपरा की पुस्तकें अधिक दिखाई दे सकती हैं।
इसलिए “हर हिंदू मनुस्मृति को मानता है” कहना उतना ही गलत है जितना “मनुस्मृति का हिंदू परंपरा में कोई महत्व ही नहीं था” कहना।
दोनों के बीच इतिहास कहीं अधिक जटिल है।
मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर क्या लिखा है?
यही वह हिस्सा है जिस पर आधुनिक समय में सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं।
मनुस्मृति के अध्याय 5 के प्रसिद्ध श्लोक 148 में महिला की स्वतंत्रता को सीमित करने वाली व्यवस्था दिखाई देती है। Patrick Olivelle के अनुवाद पर आधारित उद्धरण (Quotation) में कहा गया है कि महिला को बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए और स्वतंत्र रूप से नहीं रहना चाहिए।
इसी तरह कुछ अन्य श्लोक महिलाओं की कामुकता और पुरुषों के प्रति उनके व्यवहार को लेकर कठोर एवं आज के मानकों से स्पष्ट रूप से patriarchal भाषा इस्तेमाल करते हैं। इन्हीं अंशों को लेकर feminist scholars और सामाजिक न्याय आंदोलनों की आपत्ति रही है।
मनुस्मृति 5.148 का सच: क्या ‘स्त्री कभी स्वतंत्र न रहे’ का अर्थ वही है जो सोशल मीडिया पर बताया जाता है?
मनुस्मृति के अध्याय 5 के श्लोक 148 को लेकर सोशल मीडिया पर दोनों तरह के दावे दिखाई देते हैं, लेकिन मूल संस्कृत पाठ देखने पर स्थिति अधिक स्पष्ट है। श्लोक में कहा गया है—“बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने… न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्”, यानी बचपन में पिता, युवावस्था में पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्रों के संरक्षण/अधिकार में रहने तथा स्त्री के स्वतंत्र रूप से रहने से बचने की बात कही गई है। इसलिए यह कहना कि श्लोक में महिला की स्वतंत्रता का कोई उल्लेख नहीं है, सही नहीं होगा; ‘स्वतन्त्रताम्’ का अर्थ स्वतंत्रता/स्वायत्तता से ही जुड़ा है।
हालांकि इसे सीधे “महिला गुलाम थी” के अर्थ में पेश करना भी अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि श्लोक एक प्राचीन परिवार-आधारित guardianship व्यवस्था का वर्णन करता है और इसे उस समय के सामाजिक संदर्भ में पढ़ना जरूरी है। साथ ही मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले श्लोक भी मौजूद हैं। इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि 5.148 में महिला की स्वायत्तता सीमित करने वाली व्यवस्था स्पष्ट रूप से मौजूद है, लेकिन इस एक श्लोक को आधार बनाकर पूरे हिंदू धर्म या हर हिंदू की सोच पर निष्कर्ष निकालना भी ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी है
मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले श्लोक भी हैं। अध्याय 3 के श्लोक 55-56 में कहा गया है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां धार्मिक कर्म निष्फल हो जाते हैं। इसके अलावा मनुस्मृति में स्त्रीधन से संबंधित प्रावधान भी मिलते हैं। विद्वानों के अनुसार इसमें महिलाओं की कुछ विशिष्ट संपत्ति—जैसे विवाह के समय मिले उपहार और कुछ अन्य प्रकार की संपत्ति-को मान्यता दी गई थी।
यानी मनुस्मृति को लेकर “इसमें महिलाओं के सम्मान की बात ही नहीं है” कहना भी अधूरा निष्कर्ष होगा। लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही महत्वपूर्ण है-महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने वाले स्पष्ट प्रावधानों को केवल ‘सम्मान’ वाले श्लोकों के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जाति और शूद्रों को लेकर सबसे बड़ा विवाद क्या है?
मनुस्मृति का सबसे गंभीर विवाद वर्ण और सामाजिक पदानुक्रम से जुड़ा है।
ग्रंथ में चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए अलग-अलग कर्तव्य और सामाजिक भूमिकाओं का वर्णन मिलता है। Cambridge के विद्वान Ludo Rocher बताते हैं कि मनुस्मृति में वर्णों के लिए निर्धारित occupations और सामाजिक नियमों पर विस्तृत चर्चा है।
आलोचकों की आपत्ति इसलिए है क्योंकि कुछ श्लोक सामाजिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग अधिकार और दंड निर्धारित करते हैं।
उदाहरण के लिए, अध्याय 8 के कुछ श्लोकों में शूद्र के लिए कठोर दंडों का वर्णन मिलता है। Indian Express की scholarly-source-based explainer में अध्याय 8 के श्लोक 21 और 129 समेत ऐसे प्रावधानों को विवाद का कारण बताया गया है।
यही वह हिस्सा है जिसके कारण दलित आंदोलन, Ambedkarite विचारधारा और सामाजिक न्याय के समर्थक मनुस्मृति को जातिगत असमानता के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति क्यों जलाई?
यह इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। 25 दिसंबर 1927 को महाड़ में डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनके समर्थकों ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया। आंबेडकर के लिए यह केवल किसी किताब का विरोध नहीं था। यह उस सामाजिक व्यवस्था के विरोध का प्रतीक था जिसे वे जातिगत भेदभाव और असमानता से जोड़ते थे। आधुनिक दलित आंदोलनों में Manusmriti Dahan इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में महत्वपूर्ण है। इसलिए मनुस्मृति का विरोध केवल आज की राजनीतिक बहस से पैदा हुआ मुद्दा नहीं है। इसकी जड़ें 20वीं सदी के सामाजिक सुधार और दलित आंदोलन में भी हैं।
राहुल गांधी मनुस्मृति का विरोध क्यों करते हैं?
यह मुद्दा अब सीधे राजनीति से भी जुड़ गया है। दिसंबर 2024 में संसद में राहुल गांधी ने संविधान और मनुस्मृति के बीच वैचारिक तुलना करते हुए RSS और हिंदुत्व विचारधारा पर हमला किया था। 2025 में भी उन्होंने RSS-BJP पर यह आरोप लगाया कि वे संविधान की जगह मनुस्मृति की विचारधारा चाहते हैं। यह आरोप राजनीतिक विवाद का विषय रहा है और RSS पक्ष ने इस तरह की व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए:
राहुल गांधी का मनुस्मृति-विरोध सिर्फ किसी एक श्लोक की व्याख्या का विवाद नहीं है। यह संविधान, सामाजिक न्याय, जाति और RSS-BJP की वैचारिक दिशा को लेकर उनके व्यापक राजनीतिक तर्क का हिस्सा है।
इसलिए इसे केवल “धार्मिक विरोध” कहना भी अधूरा होगा।
क्या वामपंथी और सामाजिक न्याय के आंदोलन मनुस्मृति का विरोध करते हैं?
कई वामपंथी, Ambedkarite और सामाजिक न्याय आंदोलनों के लिए मनुस्मृति जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है। उनका तर्क है कि किसी प्राचीन ग्रंथ में लिखे नियमों को आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का नैतिक आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब उनमें जन्म, वर्ण और लिंग के आधार पर असमानता दिखाई देती हो। Cambridge के अकादमिक अध्ययनों में भी मनुस्मृति और अन्य Dharmaśāstra texts को caste और gender norms के ऐतिहासिक अध्ययन में महत्वपूर्ण माना गया है
हिंदू ज्ञान परंपरा से जुड़े लोग क्या कहते हैं?
यहां एक दिलचस्प दूसरा पक्ष सामने आता है। आध्यात्मिक शिक्षक सद्गुरु ने मनुस्मृति और Manu Dharma को लेकर कहा है कि पुराने सामाजिक वर्गीकरण को आज के संदर्भ में उसी रूप में लागू करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक व्यवस्था समय और परिस्थितियों के साथ बदलती है।
एक अन्य आध्यात्मिक व्याख्या में Sanatana Dharma और transactional social rules के बीच अंतर करते हुए कहा गया है कि सामाजिक नियम समय के साथ बदल सकते हैं। यानी हिंदू ज्ञान परंपरा के भीतर भी यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति मनुस्मृति की हर व्यवस्था को आज के लिए बाध्यकारी कानून माने।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी 2025 में हिंदू scriptures और Manusmriti पर बात करते हुए कहा था कि हिंदू किसी एक scripture का पालन करने वाली परंपरा नहीं हैं और caste discrimination को धर्म का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जहां caste discrimination के संदर्भ मिलें, उन्हें misinterpretation के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
क्या मनुस्मृति को अंग्रेजों ने हिंदू कानून बना दिया था?
यह भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रश्न है। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश अधिकारियों और Orientalist विद्वानों ने भारतीय धार्मिक और कानूनी ग्रंथों का अनुवाद और वर्गीकरण किया। मनुस्मृति को भी हिंदू law समझने के प्रयासों में महत्वपूर्ण स्थान मिला।
लेकिन आधुनिक scholarship यह दिखाती है कि भारतीय समाज में व्यवहारिक कानून केवल मनुस्मृति से संचालित नहीं था। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में अलग-अलग customary practices तथा Hindu law schools मौजूद थे। जुलाई 2026 में Solicitor General की टिप्पणी भी इसी जटिलता की ओर संकेत करती है।
इसलिए “हजारों साल तक भारत का संविधान मनुस्मृति थी” कहना ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा।
फिर मनुस्मृति में ऐसा क्या है जिसे आज भी अच्छा माना जा सकता है?
अगर ग्रंथ को आधुनिक नजर से पढ़ा जाए तो उसमें कुछ नैतिक और सामाजिक सिद्धांत ऐसे हैं जिन्हें आज भी सकारात्मक रूप में पढ़ा जा सकता है।
मसलन, ग्रंथ में अहिंसा, सत्य और दूसरे की संपत्ति न लेने जैसे नैतिक सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है। एक passage में चारों वर्णों को जीवों को नुकसान न पहुंचाने, असत्य से बचने और दूसरे की संपत्ति न लेने की बात कही गई है। महिलाओं के सम्मान का सिद्धांत भी-“जहां महिलाओं का सम्मान होता है…”आज भी परिवार और समाज के स्तर पर सकारात्मक नैतिक संदेश के रूप में पढ़ा जा सकता है। लेकिन इन सकारात्मक तत्वों को अपनाने का मतलब यह नहीं कि आधुनिक समाज को ग्रंथ के हर सामाजिक नियम को स्वीकार करना चाहिए।
सबसे बड़ा भ्रम: मनुस्मृति = पूरा हिंदू धर्म
शायद इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है। मनुस्मृति हिंदू परंपरा का एक महत्वपूर्ण Dharmaśāstra text है, लेकिन इसे पूरे हिंदू धर्म का पर्याय मानना सही नहीं है। हिंदू परंपरा बहुस्तरीय है। अलग-अलग संप्रदायों, क्षेत्रों, आचार्यों और समुदायों ने अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं को महत्व दिया है। इसलिए किसी हिंदू से यह पूछना कि “क्या आप मनुस्मृति के हर श्लोक को मानते हैं?” एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर व्यक्ति की परंपरा, ज्ञान और आस्था के आधार पर अलग हो सकता है।
मनुस्मृति को न आंख बंद करके पूजें, न बिना पढ़े खारिज करें
मनुस्मृति पर स्वस्थ बहस का रास्ता शायद इन दो अतियों के बीच से निकलता है।
एक तरफ, इसमें ऐसे श्लोक हैं जिनमें महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक hierarchy को लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से स्पष्ट टकराव दिखाई देता है। इनकी आलोचना जायज ऐतिहासिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा है।
दूसरी तरफ, इसमें धर्म, नैतिक आचरण, अहिंसा, सत्य, सामाजिक कर्तव्य और महिलाओं के सम्मान जैसे विषयों पर विचार भी हैं।
और तीसरी बात सबसे महत्वपूर्ण है-मनुस्मृति को पढ़ना और उसे आज का संविधान मानना दो अलग बातें हैं।
आज भारत का शासन भारतीय संविधान से चलता है, किसी प्राचीन धर्मशास्त्र से नहीं।
इसलिए मनुस्मृति पर असली बहस शायद यह नहीं होनी चाहिए कि “इसे मानना है या जलाना है?”
असली सवाल होना चाहिए-
“इस ग्रंथ ने अपने समय के समाज को कैसे देखा, उसमें क्या मूल्य थे, कौन-सी व्यवस्थाएं आज अस्वीकार्य हैं, और हम इतिहास को समझकर वर्तमान समाज को बेहतर कैसे बना सकते हैं?” यही दृष्टिकोण मनुस्मृति को लेकर फैले अंध-समर्थन और अंध-विरोध—दोनों से आगे जाने का रास्ता देता है।
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