उत्तराखंड के कपकोट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक सुरेश गाड़िया Suresh Gadiya के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित रूप से भ्रामक फेक कंटेंट सामग्री प्रसारित करने के मामले में पुलिस ने आरोपी जगदीश गोस्वामी को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के अनुसार आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था, लेकिन तकनीकी निगरानी और लगातार प्रयासों के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
यह मामला उस समय सामने आया जब विधायक सुरेश गाड़िया से संबंधित कथित भ्रामक फेक कंटेंट को एक शख्स सोशल मीडिया पर वायरल कर रहा था। कपकोट की जनता का आरोप है कि चुनावी माहौल को देखते हुए उनकी राजनीतिक और सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचार किया जा रहा था।
AI और डिपफेक तकनीक के इस्तेमाल का आरोप
कपकोट विधानसभा की जनता ने जर्नलिस्ट इंडिया को बातचीत के दौरान ये बताया कि उनकी तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल कर AI और डिपफेक जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से भ्रामक सामग्री तैयार की गई और उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया गया। उनका दावा है कि इस अभियान का उद्देश्य केवल विधायक की व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुंचाना ही नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की साख को भी प्रभावित करना था।
पहले ही की थी निष्पक्ष जांच की मांग
इस मामले के सामने आने के बाद विधायक सुरेश गाड़िया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पुलिस प्रशासन से निष्पक्ष और त्वरित जांच की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि यदि किसी व्यक्ति या समूह ने फर्जी सामग्री, डिपफेक या भ्रामक प्रचार के माध्यम से उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि जांच पूरी होने के बाद सच्चाई सामने आएगी और यदि कोई सुनियोजित साजिश हुई है तो उसके पीछे शामिल लोगों की पहचान भी होगी।
पुलिस की कार्रवाई जारी
पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि कथित भ्रामक सामग्री किसने तैयार की, उसे किस माध्यम से प्रसारित किया गया और क्या इस पूरे मामले में अन्य लोग भी शामिल हैं। साथ ही डिजिटल साक्ष्यों और सोशल मीडिया गतिविधियों की भी जांच की जा रही है।
चुनावी माहौल में बढ़ी डिजिटल दुष्प्रचार की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल में सोशल मीडिया पर फैलने वाली अपुष्ट और भ्रामक सामग्री लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मामलों में किसी भी वायरल पोस्ट, वीडियो या ऑडियो पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना आवश्यक है। AI और डिपफेक तकनीक के बढ़ते उपयोग ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है।
फिलहाल पूरा मामला पुलिस जांच के अधीन है। जांच और पूछताछ पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित दुष्प्रचार अभियान के पीछे कौन लोग थे, उनका उद्देश्य क्या था और क्या इसमें किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका थी।
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