Vande Mataram के पहले दो छंदों के बाद ऐसा क्या है? जानिए पूरा अर्थ और विवाद की असली वजह

नई दिल्ली: ‘वंदे मातरम्’-सिर्फ दो शब्द, लेकिन इनके भीतर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रवाद, साहित्य, धर्म और राजनीति की करीब डेढ़ सदी लंबी कहानी समाई हुई है। आज यही गीत एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। सवाल है कि कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में इसके शुरुआती दो छंदों को ही क्यों प्राथमिकता देती है और गीत के बाकी हिस्से को लेकर आखिर विवाद क्या है?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए जरूरी है कि ‘वंदे मातरम्’ को सिर्फ एक राष्ट्रगीत के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरी साहित्यिक रचना के रूप में समझा जाए।

सबसे पहले समझिए-‘वंदे मातरम्’ का अर्थ क्या है? Vande Mataram

-‘वंदे मातरम्’ का सरल अर्थ है “हे माता, मैं तुम्हें नमन करता हूं” या “मां, मैं तुम्हारी वंदना करता हूं।”

यहां ‘माता’ का अर्थ मातृभूमि से है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने भारतभूमि की कल्पना एक मां के रूप में की। शुरुआती हिस्से में इस मां का चित्रण किसी देवी के रूप में नहीं, बल्कि हरियाली, नदियों, फसलों, हवा, सुंदरता और समृद्धि से भरी धरती के रूप में होता है।

यही कारण है कि ‘वंदे मातरम्’ का शुरुआती हिस्सा भारतीय राष्ट्रवादी चेतना में बेहद लोकप्रिय हुआ।

पहले दो छंदों में क्या कहा गया है?

Vande Mataram वंदे मातरम् का पूरा अर्थ क्या है?

गीत के पहले हिस्से में कवि अपनी मातृभूमि को प्रणाम करता है। वह ऐसी धरती की तस्वीर खींचता है जहां पानी प्रचुर मात्रा में है, खेत फसलों से भरे हैं, हवाएं सुगंधित हैं और प्रकृति सुंदर है।

अर्थात पहले हिस्से में भारत को उसकी प्राकृतिक सुंदरता और मातृत्व के माध्यम से देखा गया है।

इसके बाद मातृभूमि को ऐसी मां के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो अपने बच्चों को सुख, शांति, शक्ति और जीवन देती है।

इसे सरल भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:

पहले दो छंदों का मूल भाव है-मेरी धरती मेरी मां है, वह सुंदर है, समृद्ध है और मैं उसके सामने श्रद्धा से सिर झुकाता हूं।

इसीलिए इन शुरुआती छंदों को लेकर धार्मिक आपत्ति की संभावना अपेक्षाकृत कम मानी गई।

फिर तीसरे हिस्से से कहानी क्यों बदलती है?

यहीं ‘वंदे मातरम्’ का वह हिस्सा शुरू होता है, जिसे लेकर ऐतिहासिक विवाद पैदा हुआ।

गीत के आगे बढ़ने पर मातृभूमि का चित्रण केवल प्रकृति और धरती के रूप में नहीं रहता। उसमें शक्ति और देवी के धार्मिक प्रतीक आने लगते हैं।

मातृभूमि को आगे चलकर दुर्गा के समान शक्तिशाली बताया जाता है। बाद के हिस्सों में लक्ष्मी और सरस्वती से जुड़े प्रतीकात्मक संदर्भ भी दिखाई देते हैं।

यानी कविता का स्वर बदल जाता है।

पहले हिस्से में-भारत एक सुंदर मातृभूमि है।

बाद के हिस्से में-भारत माता का रूप धार्मिक देवी-प्रतीकों से जुड़ जाता है।

यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।

दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?

हिंदू धार्मिक परंपरा में दुर्गा शक्ति और वीरता की प्रतीक हैं। लक्ष्मी समृद्धि और सरस्वती ज्ञान की प्रतीक मानी जाती हैं।

बंकिम चंद्र की रचना में मातृभूमि को इन प्रतीकों से जोड़ना साहित्यिक और राष्ट्रवादी दृष्टि से भारत की शक्ति, समृद्धि और ज्ञान का रूपक माना जा सकता है।

लेकिन यहीं एक दूसरा सवाल भी पैदा हुआ।

अगर राष्ट्रभूमि को किसी विशेष धार्मिक परंपरा की देवी के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो क्या अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग उसे समान रूप से अपना राष्ट्रीय प्रतीक मान पाएंगे?

1930 के दशक में यही सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा बना।

क्या सभी मुसलमान ‘वंदे मातरम्’ के विरोध में थे?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।

ऐतिहासिक रूप से यह कहना सही नहीं होगा कि “सभी मुसलमान वंदे मातरम् के खिलाफ थे।” ऐसा कोई एकरूप मुस्लिम मत नहीं था।

हालांकि, मुस्लिम लीग और कुछ मुस्लिम नेताओं ने गीत के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई थी। कांग्रेस के भीतर भी इस आपत्ति को गंभीरता से लिया गया।

The Nehru Archive में मिले जवाहरलाल नेहरू के 1937 के दस्तावेज में साफ दर्ज है कि कांग्रेस कार्यसमिति ने मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को कुछ हिस्सों के संबंध में वैध माना और राष्ट्रीय सभाओं में शुरुआती दो छंदों को गाने की सिफारिश की।

‘आनंदमठ’ से जुड़ा विवाद क्या था?

nehru archive documents to subhas chandra bose 20 october 1937

 

‘वंदे मातरम्’ मूल रूप से बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा था।

उपन्यास की पृष्ठभूमि 18वीं सदी के संन्यासी विद्रोह से जुड़ी है। इसमें उस समय के राजनीतिक और धार्मिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।

यही साहित्यिक पृष्ठभूमि भी बाद में विवाद का हिस्सा बनी।

The Nehru Archive के अनुसार जवाहरलाल नेहरू ने 20 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस को लिखे पत्र में ‘आनंदमठ’ की पृष्ठभूमि का अध्ययन करने और उससे मुस्लिम समुदाय में संभावित असहजता का उल्लेख किया था। साथ ही उन्होंने यह भी माना था कि विरोध का कुछ हिस्सा साम्प्रदायिक राजनीति से प्रेरित हो सकता है, लेकिन वास्तविक शिकायतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

कांग्रेस ने 1937 में दो छंदों का फैसला क्यों किया?

The Nehru Archive

 

अक्टूबर-नवंबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने इस मुद्दे पर गंभीर विचार-विमर्श किया।

नेहरू के रिकॉर्ड के अनुसार, समिति ने माना कि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय आंदोलन में इतना महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर चुका था कि उसे पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं होगा। लेकिन गीत के बाद के हिस्सों में मौजूद धार्मिक प्रतीकों को लेकर कुछ समुदायों की वास्तविक आपत्तियां थीं।

इसलिए राष्ट्रीय सभाओं के लिए पहले दो छंदों को रखने की सिफारिश की गई।

नेहरू ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि कांग्रेस इस विषय पर जल्दबाजी में नहीं पहुंची थी। उनके मुताबिक इस पर कई सप्ताह तक चर्चा और विभिन्न लोगों से विचार-विमर्श किया गया था।

नेहरू ने ‘वंदे मातरम्’ के बारे में क्या कहा था?

nehruarchive

यह पहलू आज की बहस में अक्सर छूट जाता है।

1937 में नेहरू ने लिखा कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन में इतना गहराई से जुड़ चुका था कि उसकी राष्ट्रीय भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि गीत के बाद के हिस्सों में ऐसी विचारधारा, प्रतीक और रूपक मौजूद हैं जिन्हें भारत के अलग-अलग समूह समान रूप से स्वीकार नहीं कर सकते।

यानी उस समय कांग्रेस की सोच यह नहीं थी कि ‘वंदे मातरम्’ बेकार या अस्वीकार्य है।

बल्कि सवाल यह था कि राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक ऐसा कौन-सा हिस्सा हो जिसे अधिकतम भारतीय सहजता से स्वीकार कर सकें?

क्या कांग्रेस ने पूरा गीत प्रतिबंधित कर दिया था?

नहीं।

यह अंतर समझना बेहद जरूरी है।

nehru archive vande matram

 

1937 का फैसला मुख्य रूप से राष्ट्रीय सभाओं में गायन की व्यवस्था से संबंधित था। इसका मतलब यह नहीं था कि बाकी छंदों को साहित्यिक रूप से मिटा दिया गया या उनके अस्तित्व पर रोक लगा दी गई।

The Nehru Archive के अनुसार नेहरू के एक अन्य दस्तावेज में भी यह बात सामने आती है कि ‘वंदे मातरम्’ लंबे समय से राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा रहा था और शुरुआती हिस्से पर कोई आपत्ति नहीं मानी गई।

फिर पूरा गीत पढ़ने पर उसका भाव क्या निकलता है?

अगर पूरी रचना को एक साहित्यिक क्रम में समझें तो उसका भाव कुछ इस तरह सामने आता है:

पहला चरण:

मातृभूमि को प्रणाम।

दूसरा चरण:

भारत की प्रकृति, हरियाली, जल, फसल और सुंदरता का वर्णन।

तीसरा चरण:

मातृभूमि को शक्ति और सामर्थ्य से जोड़ना।

चौथा चरण:

मां के रूप में भारत की तुलना धार्मिक देवी-प्रतीकों से करना।

पांचवां चरण:

मातृभूमि को ज्ञान, शक्ति और समृद्धि के विभिन्न प्रतीकों से जोड़ना।

यही साहित्यिक बदलाव इसे केवल प्रकृति-वर्णन से आगे ले जाकर राष्ट्रवाद और धार्मिक प्रतीकवाद के मेल वाली रचना बना देता है।

तो क्या बाद के छंद ‘धार्मिक’ हैं?

यहां शब्दों का सावधानी से इस्तेमाल करना जरूरी है।

यह कहना अधिक सटीक होगा कि बाद के छंदों में स्पष्ट हिंदू धार्मिक प्रतीकों और देवी-रूपकों का इस्तेमाल किया गया है।

इसी वजह से कुछ मुस्लिम नेताओं ने यह सवाल उठाया कि इन पंक्तियों को एक साझा राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार करने में धार्मिक असहजता हो सकती है।

दूसरी ओर, इसके समर्थक इसे धार्मिक पूजा के बजाय राष्ट्र और मातृभूमि की काव्यात्मक उपमा मानते हैं।

यानी विवाद सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि उनके अर्थ और प्रतीकात्मक व्याख्या का भी है।

आज कांग्रेस दो छंदों पर क्यों कायम है?

आज कांग्रेस का तर्क मुख्य रूप से 1937 के ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है।

कांग्रेस का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जो व्यवस्था राष्ट्रीय सभाओं के लिए स्वीकार की गई थी, उसे जारी रखना उसके ऐतिहासिक रुख के अनुरूप है।

दूसरी ओर बीजेपी का तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन का राष्ट्रीय प्रतीक रहा है और उसके मूल स्वरूप का सम्मान किया जाना चाहिए।

इस तरह करीब नौ दशक पुराना फैसला आज फिर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।

‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ का संबंध

स्वतंत्र भारत में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में विशेष राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ।

इसलिए दोनों की अपनी-अपनी ऐतिहासिक भूमिका है।

‘वंदे मातरम्’ का महत्व खास तौर पर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उसके इस्तेमाल और उससे जुड़ी राष्ट्रवादी भावना से आता है।

असली सवाल: विवाद आखिर किस बात पर है?

अगर पूरे विवाद को बहुत सरल शब्दों में समझना हो तो इसे इस तरह देखा जा सकता है—

पहले दो छंद:

भारत की धरती, प्रकृति, सुंदरता, समृद्धि और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा।

बाद के छंद:

मातृभूमि का शक्ति और हिंदू देवी-प्रतीकों के साथ रूपकात्मक संबंध।

यही वह बदलाव है जिसने 1930 के दशक में सवाल खड़ा किया कि क्या पूरी रचना को एक ऐसे राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रस्तुत किया जाए, जिसे हर धार्मिक समुदाय समान रूप से स्वीकार करे।

The Nehru Archive के दस्तावेजों के अनुसार कांग्रेस ने तब शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय सभाओं के लिए चुना। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि यह फैसला केवल किसी एक व्यक्ति का निर्णय नहीं था, बल्कि कांग्रेस कार्यसमिति के विचार-विमर्श का परिणाम था।

निष्कर्ष: ‘वंदे मातरम्’ को समझने के लिए पूरी कहानी समझनी होगी

‘वंदे मातरम्’ को केवल दो शब्दों या केवल एक राजनीतिक विवाद के रूप में देखना इस रचना के साथ न्याय नहीं होगा।

यह एक ऐसी रचना है जिसमें प्रकृति, मातृभूमि, राष्ट्रवाद, शक्ति और धार्मिक प्रतीकवाद एक साथ दिखाई देते हैं।

पहले दो छंद भारत की धरती और उसके प्राकृतिक वैभव को केंद्र में रखते हैं। आगे की पंक्तियों में भारत माता का रूप धार्मिक देवी-प्रतीकों से जुड़ जाता है। यही अंतर 1937 के ऐतिहासिक निर्णय को समझने में सबसे महत्वपूर्ण है।

और शायद यही वजह है कि लगभग 90 साल बाद भी सवाल वही है.

क्या ‘वंदे मातरम्’ को उसके पूरे साहित्यिक रूप में देखा जाए, या राष्ट्रीय आयोजनों के लिए उस हिस्से को चुना जाए जो सभी समुदायों के लिए अधिक सहज रूप से स्वीकार्य हो?

इस सवाल का जवाब इतिहास ने 1937 में अपने तरीके से दिया था। लेकिन आज की राजनीति में उस फैसले की व्याख्या फिर नए सिरे से हो रही है।

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