नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग ने पकड़ी रफ्तार, सरकार सख्त; राजशाही समर्थकों और सत्ता के बीच बढ़ा टकराव

काठमांडू। नेपाल में हिंदू राष्ट्र Nepal Hindu Rashtra और संवैधानिक राजशाही की बहाली की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। राजधानी काठमांडू समेत देश के कई हिस्सों में लगातार हो रहे प्रदर्शनों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। आंदोलन के विस्तार को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है और कई इलाकों में सार्वजनिक प्रदर्शनों पर प्रतिबंध समेत सख्त कदम उठाए हैं।

सरकार का कहना है कि देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है और संविधान के खिलाफ किसी भी गतिविधि को अनुमति नहीं दी जाएगी। वहीं, आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राजशाही समर्थक और हिंदूवादी संगठनों का दावा है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग जनता के सामने रख रहे हैं और नेपाल की पारंपरिक पहचान को फिर से स्थापित करना चाहते हैं।

आंदोलन पर कार्रवाई तेज

प्रदर्शनों के बीच सुरक्षा एजेंसियों ने आंदोलन से जुड़े कई लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की है। विभिन्न मामलों में जांच जारी है और कई नेताओं व कार्यकर्ताओं से पूछताछ की जा रही है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ प्रमुख नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि कई आंदोलनकारी सार्वजनिक रूप से सामने आने से बच रहे हैं। हालांकि सभी दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

प्रशासन ने राजधानी के संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है।

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क्यों उठ रही है हिंदू राष्ट्र की मांग?

नेपाल वर्ष 2008 तक दुनिया का एकमात्र आधिकारिक हिंदू राष्ट्र था। राजशाही की समाप्ति के बाद देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया और बाद में लागू नए संविधान में सभी धर्मों को समान संवैधानिक अधिकार दिए गए। इसके बावजूद पिछले कई वर्षों से समय-समय पर हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली की मांग उठती रही है।

आंदोलन से जुड़े संगठनों का कहना है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरी है और देश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए हिंदू राष्ट्र और संवैधानिक राजशाही पर फिर से विचार किया जाना चाहिए। दूसरी ओर सरकार और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां मौजूदा संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के पक्ष में मजबूती से खड़ी हैं।

राजनीतिक माहौल हुआ गर्म

नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने स्पष्ट किया है कि संविधान के दायरे से बाहर किसी भी बदलाव का समर्थन नहीं किया जाएगा। वहीं आंदोलनकारी संगठन अपने अभियान को और तेज करने की रणनीति बना रहे हैं। इससे आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति में टकराव और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच संवाद नहीं हुआ तो यह विवाद लंबे समय तक देश की राजनीति पर असर डाल सकता है। फिलहाल नेपाल की नजरें सरकार के अगले कदम और आंदोलन की आगामी रणनीति पर टिकी हैं।

नेपाल की राजनीति में नई चुनौती

हिंदू राष्ट्र का मुद्दा अब केवल धार्मिक या सांस्कृतिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है। यह नेपाल की राजनीतिक दिशा, संवैधानिक व्यवस्था और भविष्य की शासन प्रणाली से भी जुड़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच संवाद नहीं हुआ तो आने वाले समय में राजनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।

फिलहाल सरकार स्थिति पर नजर बनाए हुए है, जबकि आंदोलनकारी संगठन अपने अभियान को जारी रखने की बात कह रहे हैं। ऐसे में आने वाले सप्ताह नेपाल की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

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