Hidden Cancer Risks: कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के मन में आमतौर पर सिगरेट, शराब या अन्य बड़े जोखिम कारक आते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं है। मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. राजीव विजयकुमार के अनुसार, कैंसर का खतरा अक्सर धीरे-धीरे बनता है और इसमें रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों और एक्सपोजर की भी भूमिका होती है, जिन पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते। हल्का प्रदूषण, सनस्क्रीन का इस्तेमाल न करना, पर्याप्त नींद न लेना या ज्यादा प्रोसेस्ड फूड खाना, ये सभी बातें उस समय गंभीर नहीं लगतीं, लेकिन लंबे समय में असर जमा कर सकती हैं।
‘माइक्रो-एक्सपोजर’ पर कम होती है चर्चा
डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर से जुड़ी सामान्य चर्चाओं में इन तथाकथित ‘माइक्रो-एक्सपोजर’ का जिक्र कम होता है। ये छोटे जोखिम रोजाना मौजूद रहते हैं और धीरे-धीरे शरीर पर प्रभाव डालते हैं। उदाहरण के तौर पर, वायु प्रदूषण से निकलने वाले सूक्ष्म कण (PM2.5) फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं। गाड़ियों का धुआं, निर्माण की धूल और ईंधन के दहन से निकलने वाले कण लंबे समय तक संपर्क में रहने पर नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों के कैंसर के जोखिम से जुड़े पाए गए हैं। एक दिन का असर मामूली लग सकता है, लेकिन वर्षों में इसका प्रभाव बढ़ सकता है।
इसी तरह, अल्ट्रावायलेट (यूवी) किरणों का हल्का लेकिन लगातार संपर्क भी नुकसानदेह हो सकता है। समुद्र तट पर सनबर्न होने पर लोग सावधान हो जाते हैं, लेकिन रोजमर्रा की धूप जैसे ऑफिस आना-जाना, दोपहिया चलाना या आउटडोर एक्सरसाइज अक्सर नजरअंदाज हो जाती है। लगातार यूवी एक्सपोजर त्वचा की कोशिकाओं में डीएनए परिवर्तन बढ़ा सकता है।
लाइफस्टाइल भी अहम फैक्टर
विशेषज्ञों के मुताबिक खानपान और दिनचर्या भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रोसेस्ड मीट का अधिक सेवन, ज्यादा शराब, उच्च शुगर डाइट और मोटापा शरीर में सूजन, इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकते हैं। ये स्थितियां असामान्य कोशिकाओं के विकास के लिए अनुकूल वातावरण बना सकती हैं। नींद की कमी और अनियमित सर्कैडियन रिद्म पर भी शोध जारी है। नाइट शिफ्ट, कम नींद और असंतुलित दिनचर्या मेलाटोनिन और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है, जो कुछ प्रकार के कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़ी पाई गई हैं।
बचाव कैसे संभव है?
डॉ. विजयकुमार का कहना है कि उद्देश्य डर फैलाना नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़ाना है। हर छोटा जोखिम बीमारी में नहीं बदलता, क्योंकि शरीर में डीएनए रिपेयर सिस्टम और इम्यून सिस्टम जैसी प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था मौजूद होती है। फिर भी, जब छोटे-छोटे जोखिम लगातार जुड़ते रहते हैं, तो उनका प्रभाव बढ़ सकता है। नियमित रूप से सनस्क्रीन का उपयोग, घर में बेहतर वेंटिलेशन, प्रोसेस्ड मीट और शराब का सीमित सेवन, पर्याप्त नींद और लंबे समय तक बैठे रहने से बचना, ये सभी कदम समय के साथ जोखिम कम करने में मददगार हो सकते हैं। कैंसर अक्सर किसी एक बड़े फैसले का परिणाम नहीं होता, बल्कि वर्षों की आदतों का नतीजा होता है। इसलिए छोटी लेकिन लगातार सही आदतें लंबी अवधि में बड़ा फर्क डाल सकती हैं।
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.