Pappu Yadav Deepak Chaurasia Controversy : सांसद पप्पू यादव और वरिष्ठ पत्रकार एवं Live Times के न्यूज डायरेक्टर दीपक चौरसिया के बीच एक लाइव टीवी बहस के बाद विवाद और गहरा गया है। इस मामले में पप्पू यादव की ओर से दीपक चौरसिया को 10 करोड़ रुपये का मानहानि (Defamation) का कानूनी नोटिस भेजा गया है।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब संसद परिसर में पप्पू यादव द्वारा साधु का वेश धारण कर कथित मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किए जाने को लेकर लाइव बहस चल रही थी।
बहस के दौरान दीपक चौरसिया ने कहा कि जिस कथित चढ़ावा चोरी का मामला उठाया जा रहा है, उसमें आरोप साधु-संतों पर नहीं बल्कि संबंधित कर्मचारियों पर लगाए गए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आरोप कर्मचारियों पर हैं, तो साधु-संतों को इस विवाद से क्यों जोड़ा जा रहा है।
चर्चा के दौरान दीपक चौरसिया ने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी पप्पू यादव पर विभिन्न आरोप लगाती रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने पप्पू यादव से उनके राजनीतिक और आपराधिक मामलों से जुड़े सवाल पूछे। उन्होंने यह भी कहा कि पप्पू यादव पर अतीत में रंगदारी जैसे आरोप लगते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि आरोप मात्र किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं होते और ऐसे मामलों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होता है।
इन सवालों पर पप्पू यादव ने कड़ी आपत्ति जताई और बहस का माहौल गर्म हो गया। इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम बीच में ही छोड़ दिया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल Media पर भी तेजी से साझा किया गया।
10 करोड़ का मानहानि नोटिस
घटना के बाद पप्पू यादव की ओर से दीपक चौरसिया को 10 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा गया। नोटिस में कथित रूप से आरोप लगाया गया है कि लाइव कार्यक्रम के दौरान उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले बयान दिए गए।
वहीं, नोटिस मिलने के बाद दीपक चौरसिया ने भी अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रखा। उन्होंने कहा कि वह न तो झुकेंगे और न ही माफी मांगेंगे। उनके अनुसार, वह हमेशा तथ्यों के आधार पर सवाल पूछते रहे हैं और पत्रकारिता का मूल दायित्व सत्ता और जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही मांगना है।
दीपक चौरसिया ने कथित तौर पर कहा,
“मैं इसके लिए न तो झुकूंगा और न ही माफी मांगूंगा। मैं हमेशा तथ्यों पर बात करता हूं। आज तक मैंने किसी से माफी नहीं मांगी, तो अब कैसे मांगूंगा? अगर मैं सवाल पूछना छोड़ दूं और दबाव में आकर माफी मांगने लगूं, तो फिर मैं पत्रकारिता कैसे कर पाऊंगा?”
उन्होंने यह भी कहा कि
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सवाल पूछना है और यदि सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों से तीखे सवाल भी नहीं पूछे जाएंगे, तो पत्रकारिता का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
फिलहाल मामला कानूनी प्रक्रिया में है। दोनों पक्षों ने अपने-अपने दावे और तर्क सामने रखे हैं। इस विवाद पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। इस मुद्दे पर आपका क्या कहा है कमेंट कर जरूर बताएं.
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