Saudi Oil Pipeline Shutdown सऊदी की तेल पाइपलाइन बंद, होर्मुज में भी खतरा; क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

नई दिल्ली:

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर पूरी दुनिया के तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। सऊदी अरब की महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन Saudi Oil Pipeline Shutdown ड्रोन हमले के बाद बंद कर दी गई है। Reuters के अनुसार यह पाइपलाइन सऊदी अरब के तेल को लाल सागर तक पहुंचाने का वैकल्पिक रास्ता देती है और इसकी मदद से कच्चे तेल को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरे बिना निर्यात किया जा सकता है। ऐसे समय में जब होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पहले ही बुरी तरह प्रभावित है, इस पाइपलाइन का बंद होना वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इस खबर के बाद सोमवार को Saudi Gazette के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 3 फीसदी से ज्यादा उछलकर 108 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। WTI क्रूड भी 100 डॉलर के स्तर के पार बना हुआ है। बाजार में आशंका है कि अगर सऊदी पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रही और होर्मुज से तेल की आवाजाही सामान्य नहीं हुई तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।

सऊदी की सबसे अहम तेल पाइपलाइन क्यों है महत्वपूर्ण?

सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन फारस की खाड़ी से तेल को लाल सागर के पश्चिमी तट तक पहुंचाती है। इसकी क्षमता करीब 70 लाख बैरल प्रतिदिन तक बताई जाती है।

इसका सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि इसके जरिए सऊदी अरब अपने तेल के एक हिस्से को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाईपास करके लाल सागर के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा सकता है।

लेकिन अब ड्रोन हमले के बाद इस वैकल्पिक रास्ते पर भी संकट खड़ा हो गया है।

पाइपलाइन पर किसने किया हमला?

सऊदी अरब ने कहा है कि उसकी रणनीतिक ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को निशाना बनाने वाले ड्रोन इराकी क्षेत्र से लॉन्च हुए थे। हमले में बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा और कई लोग घायल हुए। सऊदी अरब ने फिलहाल तत्काल सैन्य जवाब देने से परहेज किया है, लेकिन उसने अपनी संप्रभुता और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखा है।

ताजा रिपोर्टों और AP News के मुताबिक पाइपलाइन को हुए नुकसान की मरम्मत में तीन से पांच सप्ताह तक लग सकते हैं और इस दौरान इसकी बड़ी क्षमता उपलब्ध नहीं रह सकती।

होर्मुज में भी बढ़ा खतरा

दूसरी तरफ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में भी जहाजों की आवाजाही सामान्य नहीं है। ताजा शिप-ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार सप्ताहांत में इस जलमार्ग से कमोडिटी जहाजों की आवाजाही सामान्य औसत से काफी नीचे रही।

एक व्यापारी जहाज को भी होर्मुज से गुजरते समय प्रोजेक्टाइल से नुकसान पहुंचने की खबर सामने आई है। इससे पहले युद्ध शुरू होने से पहले इस जलमार्ग से रोजाना बड़ी संख्या में जहाज गुजरते थे और दुनिया के समुद्री कच्चे तेल तथा LNG व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इस मार्ग पर निर्भर था।

यानी तेल बाजार के सामने अब दोहरी चुनौती है होर्मुज में जोखिम और सऊदी का वैकल्पिक पाइपलाइन रूट भी बंद।

क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

यह सवाल अब भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

भारत अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय क्रूड में लगातार तेजी का सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों की खरीद लागत पर पड़ता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। भारत में घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड के अलावा रुपये-डॉलर विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों के मार्जिन जैसे कई कारकों का असर पड़ता है।

लेकिन मौजूदा स्थिति तेल कंपनियों के लिए दबाव बढ़ा रही है। हालिया आकलनों के मुताबिक 100 डॉलर से ऊपर के क्रूड के बीच भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और खासकर डीजल पर मार्जिन का दबाव झेलना पड़ रहा है।

अभी दाम बढ़ेंगे या सरकार राहत देगी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल 108 डॉलर के आसपास रहने पर भारतीय तेल कंपनियां बढ़ी हुई लागत को कितने समय तक खुद वहन कर सकती हैं।

अगर क्रूड की कीमतें कुछ दिनों की बजाय कई सप्ताह तक 105-110 डॉलर या उससे ऊपर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में संशोधन की संभावना बढ़ेगी।

हालिया रिपोर्टों के मुताबिक फिलहाल तत्काल बड़ी बढ़ोतरी की संभावना को लेकर सावधानी बरती जा रही है, लेकिन अगर क्रूड लगातार ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो कीमतों को लंबे समय तक स्थिर रखना तेल कंपनियों के लिए मुश्किल हो सकता है।

महंगा क्रूड सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं

अगर तेल की कीमतों में तेजी लंबे समय तक रहती है तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल पर नहीं पड़ेगा।

ट्रांसपोर्ट, एयरलाइन, लॉजिस्टिक्स, प्लास्टिक, केमिकल, पेंट, टायर और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है।

भारत में अगस्त 2026 की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई है, जबकि थोक महंगाई भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। ऐसे में तेल की नई तेजी अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता सिर्फ 108 डॉलर का क्रूड नहीं है, बल्कि यह है कि तेल की सप्लाई कितने समय तक बाधित रहती है।

अगर सऊदी पाइपलाइन कुछ सप्ताह में चालू हो जाती है और होर्मुज में आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य होती है तो बाजार में राहत आ सकती है। लेकिन अगर दोनों मोर्चों पर व्यवधान लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल संभव है।

ऐसे में भारत के लिए तीन चीजें बेहद अहम होंगी

पहला: अंतरराष्ट्रीय क्रूड की कीमत।

दूसरा: रुपये की डॉलर के मुकाबले स्थिति।

तीसरा: भारतीय तेल कंपनियां बढ़ी हुई लागत को कितना समय तक खुद वहन करती हैं।

सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का बंद होना ऐसे समय में हुआ है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पहले से ही जोखिम में है। इसलिए तेल बाजार इसे सामान्य तकनीकी व्यवधान की तरह नहीं देख रहा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन के लिए एक गंभीर भू-राजनीतिक जोखिम के तौर पर देख रहा है।

भारत में फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी को लेकर कोई निश्चित घोषणा नहीं है। लेकिन अगर क्रूड 108 डॉलर से ऊपर लंबे समय तक टिका रहता है, तो भारतीय तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा और भविष्य में पेट्रोल-डीजल महंगा होने का जोखिम भी बढ़ सकता है।

यानी आने वाले कुछ सप्ताह भारतीय वाहन चालकों और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं।

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