JNU से मोदी और शाह को खुलेआम गालियां- कहां आ रही है इतनी हिम्मत ?

अर्बन नक्सल: बंदूक से नहीं, दिमाग से लड़ने वाली साज़िश

JNU NEWS : देश के जंगलों में छिपे नक्सली अब अंतिम सांसें गिन रहे हैं। सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि बंदूक के दम पर भारत को चुनौती देने वालों का भविष्य अंधकारमय है। लेकिन सवाल यह है-क्या खतरा सिर्फ वही था?

हकीकत यह है कि आज भारत के लिए असली चुनौती उन लोगों से है जो हथियार नहीं उठाते, बल्कि विचारों में ज़हर घोलते हैं। इन्हें ही आम तौर पर अर्बन नक्सल कहा जाता है.

दिल्ली दंगे और सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश

दिल्ली दंगों के कथित मास्टरमाइंड्स को सुप्रीम कोर्ट से जमानत न मिलना केवल एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह एक स्पष्ट संदेश भी है कि हिंसा की साज़िश को “असहमति” के नाम पर वैधता नहीं दी जा सकती।

कोर्ट की सख़्ती के बाद जिस तरह कुछ विश्वविद्यालय परिसरों, खासकर JNU, में फिर से हलचल बढ़ी है, वह कई सवाल खड़े करती है।

JNU और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की पुनः सक्रियता

नारेबाज़ी कोई नई बात नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ खुलेआम आपत्तिजनक नारे लगना यह दर्शाता है कि मामला केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। जेएनयू में 5 जनवरी 2026 की रात को पीएम मोदी और अमित शाह के खिलाफ ‘कब्र खुदेगी’ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए गए. जर्नलिस्ट इंडिया सूत्रों के मुताबिक ये नारे जेएनयू के साबरमती हॉस्टल के बाहर लगाए गए.

यह वही कैंपस है, जिससे कभी उमर खालिद जैसे नाम जुड़े रहे हैं जिन पर देश विरोधी साज़िशों में शामिल होने के आरोप लगे और जो आज भी एक बड़े वैचारिक नेटवर्क का प्रतीक माने जाते हैं।

विदेशी समर्थन और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उमर खालिद जैसे मामलों में अब विदेशी प्लेटफॉर्म्स और अमेरिकी लॉबी की सक्रियता देखी जा रही है।

मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में भारत की न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाते हैं, जबकि ज़मीनी सच्चाई यह है कि भारत का संविधान हर नागरिक को बोलने का अधिकार देता है-लेकिन देश तोड़ने की छूट नहीं।

यह कोई संयोग नहीं हो सकता कि जैसे ही देश के भीतर कानून अपना काम करता है, वैसे ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें तेज़ हो जाती हैं।

अर्बन नक्सल- अदृश्य लेकिन ख़तरनाक

अर्बन नक्सली बंदूक नहीं उठाते, इसलिए वे सीधे दिखाई नहीं देते.

वे छात्रों और विश्वविद्यालयों में नैरेटिव बनाते हैं

मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए भ्रम फैलाते हैं

न्यायपालिका और संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करते हैं

और युवाओं को “क्रांति” के नाम पर अराजकता की ओर धकेलते हैं

यही कारण है कि इन्हें समाज में बारूद कहा जाता है जो चुपचाप सुलगता है और सही समय पर विस्फोट करता है.

लड़ाई सिर्फ सुरक्षा की नहीं, चेतना की है

भारत आज केवल नक्सलवाद से नहीं, बल्कि वैचारिक युद्ध से जूझ रहा है। यह लड़ाई गोलियों से नहीं, बल्कि सच, जागरूकता और राष्ट्रीय चेतना से जीती जाएगी.

ज़रूरत है कि देश यह पहचाने कि असहमति और देशद्रोह के बीच की रेखा कहां खत्म होती है.

नक्सली जंगलों में हार रहे हैं ऐसे में अगर अर्बन नक्सल की पहचान और चुनौती नहीं समझी गई, तो यह लड़ाई शहरों और कैंपसों में लंबी खिंच सकती है.

भारत को तोड़ने के सपने देखने वालों को याद रखना चाहिए यह देश बहस से नहीं डरता, लेकिन साज़िश को कभी स्वीकार नहीं करता.

 

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