राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत Mohan Bhagwat ने न्यूयॉर्क New York में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत की सांस्कृतिक पहचान और मानवता के मूल विचार पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान ही विविधता में एकता है और यह भावना देश के सामाजिक एवं सांस्कृतिक DNA में मौजूद है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘Universal Oneness Celebration’ कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि भारत में अलग-अलग भाषाएं, परंपराएं, पहनावे और पूजा-पद्धतियां होने के बावजूद लोगों के बीच एक गहरा जुड़ाव है। उनके मुताबिक विविधता को स्वीकार करना ही भारत की विशेषता है।
“विविधता को मनाना, सम्मान देना और स्वीकार करना जरूरी”
मोहन भागवत ने कहा कि भारत के संदर्भ में अक्सर ‘विविधता में एकता’ की बात की जाती है। उन्होंने इसे केवल एक विचार नहीं बल्कि भारतीय समाज की मूल प्रकृति से जुड़ा हुआ बताया।
उन्होंने कहा कि विविधता को सेलिब्रेट किया जाना चाहिए, उसका सम्मान होना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही लोगों को इस भावना को बनाए रखना चाहिए कि वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
भागवत ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक भूमिका और नियति होती है। उनके अनुसार भारत की भूमिका दुनिया को यह समझाने की है कि अलग-अलग विविधताओं के बावजूद एकता कायम रह सकती है।

“सही सोच इंसान को ऊपर उठाती है”
अपने संबोधन में भागवत ने इंसान की सोच और उसके व्यवहार के बीच संबंध पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस प्रकार सोचता है, उसी दिशा में उसका जीवन आगे बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि सही तरीके से सोचने पर व्यक्ति ईश्वर के करीब जाता है, जबकि गलत सोच उसे पशु-जगत के करीब ले जाती है।
उन्होंने मानव समाज को आपसी संबंधों से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि बाहरी रूप, पहनावा या पूजा की पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन इंसानियत के स्तर पर सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं।
अमेरिका में रह रहे भारतीयों से कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी निभाने की अपील
मोहन भागवत ने अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों को उनकी कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश भी दिया।
उन्होंने कहा कि जो लोग अमेरिका में रहते हैं, काम करते हैं और वहीं अपना जीवन बना रहे हैं, उन्हें अमेरिका के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए। उन्होंने इसे ‘कर्मभूमि’ के प्रति कर्तव्य से जोड़ा।
भागवत ने यह भी कहा कि भारत उनकी जन्मभूमि है और यदि वे भारत के लिए कुछ करना चाहते हैं तो वे अपनी कर्मभूमि की जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद ऐसा कर सकते हैं।
“कितना कमाते हैं से ज्यादा महत्वपूर्ण है कितना बांटते हैं”
अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने भौतिक उपलब्धियों और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बात भी रखी। उन्होंने कहा कि जीवन की सफलता को केवल कमाई के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।
उनका संदेश था कि व्यक्ति ने कितना अर्जित किया, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसने समाज और दूसरों के लिए कितना योगदान दिया।
कार्यक्रम में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़े लोग भी शामिल हुए। कार्यक्रम का केंद्रीय संदेश एकता, विविधता, मानवता और आपसी सहयोग पर केंद्रित रहा।
दुनिया को भारत का संदेश
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संबोधन ऐसे समय में हुआ जब दुनिया के कई हिस्सों में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मतभेदों को लेकर बहस जारी है। अपने संबोधन के जरिए उन्होंने भारत की उस परंपरा को रेखांकित किया जिसमें अलग-अलग पहचान के बावजूद एक साथ रहने की भावना को महत्व दिया जाता है।
उनके भाषण का मूल संदेश यही रहा कि विविधता और एकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विविधता समाज को अलग-अलग रंग देती है, जबकि एकता उसे जोड़कर रखती है।
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