Dimagi Naxal: चिदंबरम के गृह मंत्री रहते नक्सलवाद कितना खतरनाक था? आंकड़े खोलेंगे पूरी कहानी

Dimagi Naxal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान ने देश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। बयान की गूंज कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम तक पहुंची, जिन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताया। इसके बाद सवाल सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रहा। अब नजर उस दौर के रिकॉर्ड पर है, जब यही पी. चिदंबरम देश के गृह मंत्री थे और भारत नक्सली हिंसा की सबसे गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा था।

पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान के बाद नक्सलवाद को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री के बयान ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि जब चिदंबरम देश के गृह मंत्री थे, तब नक्सलवाद से निपटने के लिए केंद्र सरकार की क्या रणनीति थी? कितनी जानें गईं? 2010 में दंतेवाड़ा में 76 सुरक्षाकर्मियों की मौत वाला हमला क्यों हुआ और उसके बाद चिदंबरम ने इस्तीफे की पेशकश क्यों की? उस दौरान नक्सली हिंसा का स्तर क्या था, कौन से बड़े हमले हुए और सरकार ने उनका सामना कैसे किया?

 

इन सवालों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर सरकारी रिकॉर्ड और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर समझना जरूरी है।

कब तक गृह मंत्री रहे P. Chidambaram?

 

पी. चिदंबरम ने नवंबर 2008 में मुंबई आतंकी हमलों के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। उनका कार्यकाल ऐसे समय में शुरू हुआ जब आतंकवाद के साथ-साथ Left Wing Extremism यानी नक्सलवाद भी देश की बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में शामिल था।

अगस्त 2009 की मुख्यमंत्रियों की आंतरिक सुरक्षा बैठक में चिदंबरम ने नक्सलवाद को देश की प्रमुख आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में शामिल किया था। उन्होंने केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय के जरिए इससे निपटने की जरूरत पर जोर दिया था।

उस दौर में केंद्र की घोषित नीति सुरक्षा कार्रवाई के साथ विकास को आगे बढ़ाने की थी। चिदंबरम ने कहा था कि नक्सली स्कूलों, सड़कों और टेलीफोन टावर जैसी विकास परियोजनाओं को निशाना बनाते हैं। इसलिए सरकार को सुरक्षा कार्रवाई के साथ विकास कार्यों को भी जारी रखना होगा।

चिदंबरम के दौर में नक्सलवाद का आंकड़ा क्या कहता है?

गृह मंत्रालय की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 2009 से 2013 के बीच देश में 8,782 LWE हिंसक घटनाएं हुईं। इन घटनाओं में नागरिकों और सुरक्षा बलों समेत 3,336 लोगों की मौत हुई।

 

चिदंबरम के दौर में नक्सलवाद का आंकड़ा क्या कहता है?
चिदंबरम के दौर में नक्सलवाद का आंकड़ा क्या कहता है?

 

इन आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण ट्रेंड दिखाई देता है। 2010 के बाद नक्सली हिंसा से जुड़ी घटनाओं और मौतों में लगातार कमी आई। 2010 में 2,213 घटनाओं के मुकाबले 2012 में 1,415 और 2013 में 1,136 घटनाएं दर्ज हुईं। इसलिए यह कहना कि चिदंबरम के गृह मंत्री रहते नक्सलवाद केवल बढ़ा या केवल घटा, पूरी तस्वीर नहीं बताता। पूरे कार्यकाल के वर्षवार आंकड़ों को देखना जरूरी है।

 

2010: चिदंबरम के कार्यकाल का सबसे खूनी साल

 

चिदंबरम के गृह मंत्री कार्यकाल में 2010 नक्सली हिंसा के लिहाज से सबसे गंभीर वर्षों में रहा। 6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में CPI (Maoist) के हमले में 75 CRPF जवान और स्थानीय पुलिस के एक हेड कांस्टेबल समेत कुल 76 सुरक्षाकर्मी मारे गए।

गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड में इस हमले को 6 अप्रैल 2010 की घटना के रूप में दर्ज किया गया है। उस समय CRPF की टुकड़ी इलाके में Area Domination और Long Range Patrol जैसी कार्रवाई में लगी थी। बाद में संसद में चिदंबरम ने गृह मंत्री के तौर पर इस घटना पर बयान देते हुए ऑपरेशन की परिस्थितियों का विवरण दिया था।दंतेवाड़ा हमले ने सरकार की नक्सल रणनीति और सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए।

 

दंतेवाड़ा हमले के बाद चिदंबरम ने की थी इस्तीफे की पेशकश

 

दंतेवाड़ा हमले के बाद चिदंबरम ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए गृह मंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश की थी। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। इस लिहाज से मौजूदा राजनीतिक बहस के बीच यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में से एक के बाद तत्कालीन गृह मंत्री ने खुद राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने की बात कही थी।

 

Operation Green Hunt पर चिदंबरम का क्या रुख था?

 

नक्सलवाद पर चर्चा में Operation Green Hunt का नाम अक्सर लिया जाता है। हालांकि, इस नाम को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। नवंबर 2009 में चिदंबरम ने ‘Operation Green Hunt’ नाम के किसी केंद्रीय अभियान से इनकार किया था। उन्होंने इसे मीडिया की ओर से दिया गया नाम बताया था। उनका कहना था कि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्यों की है, जबकि केंद्र सरकार जरूरत के अनुसार केंद्रीय बल, खुफिया जानकारी और तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रही थी।इसलिए Operation Green Hunt को चिदंबरम सरकार की आधिकारिक केंद्रीय योजना के तौर पर पेश करना विवादित होगा। हां, उस समय केंद्र और राज्यों के बीच संयुक्त एंटी-नक्सल ऑपरेशन और केंद्रीय बलों की तैनाती जरूर हो रही थी।

 

क्या सरकार की नीति सिर्फ सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित थी?

 

नहीं। तत्कालीन गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड में नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा कार्रवाई के साथ विकास और पुनर्वास को भी महत्वपूर्ण बताया गया था। 2009 में चिदंबरम ने सरकार की नीति को विकास और पुलिस कार्रवाई के दोहरे मॉडल के तौर पर पेश किया था। इसके अलावा नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति भी लागू थी। गृह मंत्रालय के अनुसार 2008 से 2010 के बीच 816 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। इनमें 2008 में 400, 2009 में 150 और 2010 में 266 आत्मसमर्पण शामिल थे। पुनर्वास पैकेज में तत्काल आर्थिक सहायता, तीन साल तक स्टाइपेंड और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसे प्रावधान शामिल थे।इससे स्पष्ट होता है कि उस दौर की सरकारी नीति केवल सुरक्षा अभियानों तक सीमित नहीं थी।

 

क्या चिदंबरम के कार्यकाल में नक्सली हिंसा कम हुई?

 

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2010 के बाद नक्सली हिंसा में गिरावट आई। 2010 में LWE से जुड़ी 2,213 घटनाएं और 1,005 मौतें दर्ज हुईं। 2011 में घटनाएं घटकर 1,760 और मौतें 611 हुईं। 2012 में 1,415 घटनाएं और 415 मौतें दर्ज हुईं, जबकि 2013 में घटनाओं की संख्या 1,136 और मौतों की संख्या 397 रही। हालांकि, इस गिरावट का पूरा श्रेय किसी एक व्यक्ति या एक नीति को देना आंकड़ों से सीधे साबित नहीं होता। नक्सलवाद से निपटने की प्रक्रिया में केंद्र सरकार, राज्य पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, खुफिया तंत्र, विकास योजनाओं और स्थानीय प्रशासन की भूमिका रही है।

 

2010 में हुए बड़े नक्सली हमले

 

  • 2010 में नक्सली संगठनों ने सुरक्षा बलों के खिलाफ कई बड़े और घातक हमले किए।

  • 15 फरवरी 2010 को पश्चिम बंगाल के Silda में EFR कैंप पर हमला हुआ, जिसमें 24 EFR जवान और एक नागरिक मारे गए।

  • 4 अप्रैल 2010 को ओडिशा के Koraput में लैंडमाइन ब्लास्ट में 11 SOG personnel मारे गए।

  • 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा हमले में 75 CRPF जवान और एक स्थानीय पुलिसकर्मी मारे गए।

  • 17 मई 2010 को दंतेवाड़ा में लैंडमाइन ब्लास्ट हुआ, जिसमें सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत कई लोगों की मौत हुई।

  • 29 जून 2010 को Narayanpur में Maoist ambush में 27 CRPF जवान मारे गए।

 

2010 में हुए बड़े नक्सली हमले
2010 में हुए बड़े नक्सली हमले

इन घटनाओं से पता चलता है कि 2010 में नक्सली संगठन सुरक्षा बलों के खिलाफ बड़े हमले करने की क्षमता रखते थे।

 

BJP आज चिदंबरम से सवाल क्यों कर रही है?

 

मौजूदा विवाद में BJP का राजनीतिक तर्क यह है कि अगर एक पूर्व गृह मंत्री आज खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताते हैं, तो उनके गृह मंत्री कार्यकाल और नक्सलवाद से निपटने की नीति पर भी सवाल उठने चाहिए। BJP ने इस बहस में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 2006 के उस आकलन का भी हवाला दिया है, जिसमें नक्सलवाद को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में बताया गया था। हालांकि, दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि चिदंबरम खुद गृह मंत्री रहते नक्सलवाद को गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती बता चुके थे और उनकी घोषित नीति में पुलिस कार्रवाई स्पष्ट रूप से शामिल थी। इसलिए इस राजनीतिक बहस का वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि अलग-अलग सरकारों ने अलग-अलग समय पर नक्सलवाद से निपटने के लिए कौन सी रणनीति अपनाई और उसका परिणाम क्या रहा।

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2009-13 बनाम 2014-18: आंकड़े क्या बताते हैं?

 

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2009 से 2013 के बीच 8,782 LWE घटनाएं हुईं और 3,336 लोगों की मौत हुई।

वहीं 2014 से 2018 के बीच 4,969 LWE घटनाएं और 1,321 मौतें दर्ज हुईं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-18 की पांच साल की अवधि में 2009-13 की तुलना में LWE घटनाओं में 43.4 प्रतिशत और मौतों में 60.4 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।

2009-13 बनाम 2014-18: आंकड़े क्या बताते हैं?
2009-13 बनाम 2014-18: आंकड़े क्या बताते हैं?

 

ये आंकड़े BJP के उस राजनीतिक दावे के लिए आधार देते हैं कि उसके शासनकाल में नक्सली हिंसा में बड़ी गिरावट आई। हालांकि, दोनों अवधियों की तुलना करते समय सुरक्षा नीति, राज्यों की स्थिति, प्रशासनिक पहुंच और अन्य परिस्थितियों में आए बदलावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

 

नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने में कहां कमजोर रही कांग्रेस?

 

कांग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार के दौर में नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा कार्रवाई और विकास, दोनों पर जोर दिया गया था। लेकिन समस्या की व्यापकता को देखते हुए यह रणनीति नक्सलवाद को निर्णायक रूप से खत्म करने में सफल नहीं हो सकी।

कांग्रेस काल की सबसे बड़ी कमजोरी के तौर पर केंद्र और राज्यों के बीच पर्याप्त समन्वय, स्थानीय पुलिस की क्षमता, खुफिया तंत्र और प्रभावित इलाकों में प्रशासन की मजबूत मौजूदगी को देखा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि 2009 में खुद चिदंबरम ने पुलिस में बजट, भर्ती, प्रशिक्षण, उपकरण और तकनीक से जुड़ी गंभीर कमियों को स्वीकार किया था।

कांग्रेस सरकार की नीति की दूसरी बड़ी चुनौती सुरक्षा और विकास के बीच प्रभावी तालमेल थी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सिर्फ सुरक्षा अभियान चलाना पर्याप्त नहीं था। वहां स्थानीय लोगों का भरोसा जीतना, प्रशासन को गांवों तक पहुंचाना, रोजगार और शिक्षा के अवसर बढ़ाना तथा बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी था। इन मोर्चों पर लगातार और तेज कार्रवाई की कमी ने समस्या को लंबे समय तक बनाए रखने में भूमिका निभाई।

 

बहरहाल 31 मार्च 2016 को देश नक्सलमुक्त घोषित हो गया है, लेकिन पीएम मोदी के लाल किले की प्रचीर से दिए गए दिमागी नक्सल वाले बयान ने बिना किसी का नाम लिए विपक्षी दलों में खलबली पैदा कर दी है. लेफ्ट पार्टियों से लेकर कांग्रेस और कई बॉलीवुड हस्तियां अब खुद को दिमागी नक्सल कहकर वीडियो शेयर कर रही हैं.

पीएम मोदी ने क्या कहा था?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में नक्सलवाद के हथियारबंद स्वरूप के कमजोर पड़ने के बावजूद उसकी वैचारिक चुनौती को लेकर आगाह किया। उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के जरिए ऐसी सोच की ओर इशारा किया, जिसे वे नक्सली विचारधारा के वैचारिक विस्तार से जोड़ते हैं। पीएम मोदी का जोर इस बात पर था कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल बंदूक और सुरक्षा अभियान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसी विचारधारा के प्रभाव को भी समझना और उसका मुकाबला करना जरूरी है।

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