ब्रिटिश दौर की इमारतों से नई सोच तक
प्रधानमंत्री ने कहा कि South Block और North Block जैसी इमारतें औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक सोच को लागू करने के लिए बनाई गई थीं, जबकि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन देशवासियों की आकांक्षाओं को साकार करने के लिए निर्मित हुए हैं। यहां से लिए जाने वाले निर्णय किसी शासक वर्ग की सोच नहीं, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने का माध्यम बनेंगे। उन्होंने बताया कि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक देश के इतिहास का अहम हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें संग्रहालय के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया है।
प्रेरणादायी और प्रभावी कार्यस्थल की जरूरत
प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी का पहला चरण पूरा हो चुका है और विकसित भारत की झलक केवल नीतियों में ही नहीं, बल्कि कार्यस्थलों और इमारतों में भी दिखनी चाहिए। जहां से देश का संचालन होता है, वह स्थान प्रेरक और आधुनिक होना चाहिए। उन्होंने उल्लेख किया कि पुरानी इमारतें जर्जर हो चुकी थीं और वहां जगह की कमी भी थी।
खर्च और समय की बचत
प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के दशकों बाद भी केंद्र सरकार के कई मंत्रालय दिल्ली के 50 से अधिक स्थानों से संचालित हो रहे थे। इन दफ्तरों के किराए पर हर साल 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होते थे। रोजाना हजारों कर्मचारियों को अलग-अलग इमारतों के बीच आवाजाही करनी पड़ती थी, जिससे समय और संसाधनों की बर्बादी होती थी। सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के निर्माण से इन खर्चों में कमी आएगी और कार्यक्षमता बढ़ेगी।
गुलामी की मानसिकता से मुक्ति पर जोर
उन्होंने कहा कि देश को औपनिवेशिक प्रतीकों और मानसिकता से बाहर निकालना जरूरी है। इसी सोच के तहत National War Memorial और पुलिस स्मारक जैसे कदम उठाए गए। इसके अलावा रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया, जो शासन की कार्यशैली को सेवा की भावना से जोड़ने का प्रयास था।
कर्तव्य पथ का जिक्र
प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस मार्ग को पहले राजपथ कहा जाता था, उसे Kartavya Path के रूप में विकसित किया गया। अब यह स्थान नागरिकों, परिवारों और बच्चों के लिए एक जीवंत सार्वजनिक स्थल बन चुका है। उन्होंने कहा कि सेवा तीर्थ नए भारत की सोच का प्रतीक है—ऐसा स्थान जहां से राष्ट्र संचालन हो और जो देशवासियों को प्रेरणा दे।