NCERT Book: “संस्था को बदनाम नहीं होने दूंगा”, NCERT किताब के चैप्टर पर CJI का सख्त संदेश

NCERT Book: सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियरी में करप्शन से जुड़ी NCERT की क्लास 7 की टेक्स्टबुक के कंटेंट पर खुद से संज्ञान लिया है। CJI ने कहा कि मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की इजाजत नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।

NCERT Book: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कक्षा 8 की NCERT सोशल साइंस पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े कंटेंट पर स्वत: संज्ञान लिया। शीर्ष अदालत ने इसे “गंभीर चिंता” का विषय बताया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े पहलुओं के बारे में पढ़ाया जा रहा है, जो चिंता का विषय है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए CJI ने कहा, “मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संस्थान के प्रमुख के रूप में उन्होंने अपना दायित्व निभाते हुए मामले का संज्ञान लिया है। उनके अनुसार, यह एक सोचा-समझा कदम प्रतीत होता है, हालांकि उन्होंने इस पर अधिक टिप्पणी करने से परहेज किया।

“कुछ दिन प्रतीक्षा करें, मैं स्वयं देखूंगा मामला”

सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि बार और बेंच दोनों इस मुद्दे को लेकर चिंतित हैं। “कृपया कुछ दिन इंतजार करें। सभी हाई कोर्ट के न्यायाधीश भी इस विषय से व्यथित हैं। मैं इस मामले को स्वयं देखूंगा,” उन्होंने कहा। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि पुस्तक की सामग्री संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) के सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत हो सकती है। बाद में जस्टिस कांत ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत ने इस विषय पर स्वत: संज्ञान लिया है।

किताब में क्या है उल्लेख?

नई सोशल साइंस पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र किया गया है, जिनमें भ्रष्टाचार, मामलों का अत्यधिक लंबित रहना (बैकलॉग) और न्यायाधीशों की संख्या में कमी शामिल है। “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” शीर्षक वाले हिस्से में यह भी उल्लेख है कि न्यायाधीश आचार संहिता (Code of Conduct) से बंधे होते हैं, जो न केवल अदालत के भीतर बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा सामग्री और न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

 

 

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