Middle East War: मिडिल ईस्ट तनाव से भारत के पोर्ट पर भारी जाम, 4 लाख टन बासमती और 5400 टन प्याज समुद्र में फंसा

Middle East War: मिडिल ईस्ट के युद्ध ने भारत की सप्लाई चेन को गहरे संकट में डाल दिया है। यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा, तो कृषि निर्यात, उद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

Middle East War: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक व्यापार मार्गों पर साफ दिखाई देने लगा है। खास तौर पर Strait of Hormuz और Persian Gulf से गुजरने वाली सप्लाई चेन गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। इस भू-राजनीतिक स्थिति का सीधा असर भारत के पश्चिमी तट के व्यापारिक मार्गों पर पड़ रहा है। Jawaharlal Nehru Port Trust और Mundra Port जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर लॉजिस्टिक्स जाम की स्थिति बन गई है। युद्ध के चलते कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने फिलहाल नई बुकिंग रोक दी है और जहाजों को लंबा रास्ता अपनाते हुए Cape of Good Hope के जरिए भेजा जा रहा है।

इसके कारण हजारों कंटेनर, जिनमें महंगे कृषि और औद्योगिक उत्पाद भरे हुए हैं, भारतीय बंदरगाहों पर फंस गए हैं। इसका असर घरेलू बाजारों पर भी पड़ रहा है। Vashi APMC Market में ‘रिवर्स फ्लो क्राइसिस’ देखने को मिल रहा है, जहां निर्यात के लिए तैयार माल वापस मंडियों में पहुंच रहा है।

कृषि निर्यात पर सबसे ज्यादा असर

भारत से मिडिल ईस्ट भेजे जाने वाले कृषि उत्पादों पर इस संकट की सबसे बड़ी मार पड़ी है। मौजूदा स्थिति में बड़ी मात्रा में निर्यात बंदरगाहों या ट्रांज़िट में अटका हुआ है।

  • बासमती चावल: लगभग 4 लाख टन (2 लाख टन भारतीय बंदरगाहों पर, 2 लाख टन ट्रांज़िट में)

  • ताजा अंगूर: 5,000 से 6,000 टन (300 से ज्यादा कंटेनर)

  • प्याज: करीब 5,400 टन (150–200 कंटेनर, मुख्य रूप से नासिक से)

  • केला और अनार: 1,000 से अधिक रीफर यूनिट्स में सैकड़ों टन

  • फ्रोजन बफेलो मीट: 300 से ज्यादा पेरिशेबल कंटेनरों में बड़ी मात्रा

  • कुल कंटेनर: लगभग 23,000 मिडिल ईस्ट जाने वाले कंटेनर पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर अटके हुए हैं

आयात में देरी से उद्योग पर दबाव

निर्यात ही नहीं, बल्कि आयातित सामान की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है।

  • सल्फर और जिप्सम: करीब 3 लाख टन शिपमेंट में देरी

  • ड्राई फ्रूट्स और खजूर: 600–700 कंटेनर Bandar Abbas जैसे हब पर अटके

  • LPG: कम से कम 5 बड़े कैरियर जहाजों को रास्ता बदलना पड़ा या उनकी यात्रा टाल दी गई

ऊर्जा आपूर्ति पर भी खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि भारत के करीब 85% एलपीजी और 55% एलएनजी आयात इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं। ऐसे में आपूर्ति में व्यवधान घरेलू गैस की कीमतों और उद्योगों की लागत बढ़ा सकता है।

मंडियों में कीमतें गिरीं, कंटेनरों का ढेर

मिडिल ईस्ट को निर्यात रुकने से किसानों और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। Vashi APMC Market में केले की कीमत 25 रुपये प्रति किलो से घटकर करीब 15 रुपये प्रति किलो रह गई है, क्योंकि निर्यात के लिए तैयार माल वापस बाजार में पहुंच रहा है।

वहीं Jawaharlal Nehru Port Trust पर 5,000 से अधिक कंटेनर जमीन पर खड़े हैं और टर्मिनल तथा पार्किंग प्लाजा पूरी तरह भर चुके हैं। एक्सपोर्टर्स को हर कंटेनर के लिए रोजाना लगभग 8,500 रुपये बिजली (प्लग-इन) और स्टोरेज शुल्क भी देना पड़ रहा है।

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने भारत की सप्लाई चेन को गंभीर संकट में डाल दिया है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कृषि निर्यात, औद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाजार की कीमतों पर व्यापक असर पड़ सकता है।

 

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