Israel Iran War: ईरान, तेल और पुतिन.. चार साल बाद बदली अमेरिका की रणनीति, तेल संकट बना रूस के लिए सुनहरा मौका

Israel Iran War: अमेरिका अब रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंधों को कम करने के लिए कदम उठा रहा है। अमेरिका ने रूसी तेल पर 2022 के बाद कब-कब और क्यों प्रतिबंध लगाया, और अब उसे अपने फैसले बदलने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा। इसके बारे में विस्तार से पढ़िए।

Israel Iran War: अमेरिका ने रूस के कच्चे तेल पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों में आंशिक ढील देने का फैसला किया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मार्च 2026 में भारत सहित कुछ देशों को रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट प्रदान की है। यह निर्णय ऐसे समय लिया गया है जब अमेरिका लंबे समय से अन्य देशों पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बना रहा था। ऐसे में सवाल उठता है कि रूस पर तेल से जुड़े प्रतिबंध कब और क्यों लगाए गए थे और अब अमेरिका को अपने रुख में नरमी क्यों लानी पड़ी।

रूस पर तेल प्रतिबंध कब और क्यों लगे

दरअसल, 24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था। इसके बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मॉस्को की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। रूस की आय का बड़ा हिस्सा तेल और गैस निर्यात से आता है, इसलिए मार्च 2022 में अमेरिका ने अपने यहां रूसी कच्चे तेल, गैस और कोयले के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। उस समय अमेरिकी प्रशासन ने कहा था कि इसका उद्देश्य व्लादिमीर पुतिन की युद्ध मशीन को आर्थिक रूप से कमजोर करना है।

भारत और चीन को रियायती दर पर तेल

इसके बाद दिसंबर 2022 में अमेरिका, यूरोपीय संघ और G7 देशों ने मिलकर रूसी कच्चे तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की प्राइस कैप सीमा लागू कर दी। इसका मकसद यह था कि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनी रहे, लेकिन रूस को उससे ज्यादा लाभ न मिल सके। इन प्रतिबंधों के बाद रूस ने अपना तेल कम कीमत पर भारत और चीन जैसे देशों को बेचना शुरू कर दिया। इसी बीच अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ भी लगाया था, ताकि वह रूसी तेल की खरीद कम करे।

अमेरिका को क्यों बदलना पड़ा रुख

हालांकि वर्तमान में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता के कारण अमेरिका को अपने सख्त रुख में नरमी लानी पड़ी। इसका एक बड़ा कारण मध्य-पूर्व में बढ़ता युद्ध संकट है। ईरान और इजरायल तथा अमेरिका के बीच बढ़ती टकराव की स्थिति के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 से 30 प्रतिशत इसी रास्ते से होकर गुजरता है, इसलिए यहां संकट का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत पड़ता है।

दूसरी वजह वैश्विक ऊर्जा संकट और महंगाई का खतरा है। यदि मध्य-पूर्व से तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा सकता है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के अनुसार, तेल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित रखने और बाजार में सप्लाई बनाए रखने के लिए यह अस्थायी छूट देना जरूरी हो गया था। महंगे कच्चे तेल के कारण अमेरिका में भी ईंधन की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो रहा था।

समंदर में फंसा रूसी तेल भी बड़ी वजह

अमेरिका के फैसले के पीछे एक और कारण यह भी है कि समुद्र में बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल ट्रांजिट में फंसा हुआ है। यदि इस तेल को जल्द रिफाइनरियों तक नहीं पहुंचने दिया जाता, तो वैश्विक बाजार में तेल की कमी से आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता था। कुल मिलाकर यह फैसला इस बात का उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार राष्ट्रीय हित और आर्थिक जरूरतें सख्त प्रतिबंधों से भी ज्यादा अहम हो जाती हैं। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इसे केवल 30 दिन का अस्थायी कदम बता रहा है, लेकिन साफ है कि मध्य-पूर्व के मौजूदा संकट ने अमेरिका को अपनी ही प्रतिबंध नीति में व्यावहारिक बदलाव करने पर मजबूर कर दिया। वहीं इस स्थिति ने रूस को भारत समेत कई देशों को अपना कच्चा तेल बेचने का नया अवसर भी दे दिया है।

 

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