ईरान के कानून के अनुसार, ऐसी स्थिति में एक अंतरिम परिषद काम करती है, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पजेशकियान, मुख्य न्यायाधीश घोलम-होसैन मोहसेनी-एजेई और गार्जियन काउंसिल का एक धर्मगुरु शामिल होता है। यही तीन सदस्य संक्रमण काल में शासन की बागडोर संभालते हैं।
खामेनेई (86) की शनिवार को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य हमले में मौत हुई थी। इस हमले में कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के प्रमुख जनरल मोहम्मद पाकपोर भी इस कार्रवाई में मारे गए। इसके बाद अहमद वहीदी को IRGC का नया प्रमुख नियुक्त किया गया है।
कौन हैं अलीरेज़ा अराफ़ी?
अलीरेज़ा अराफ़ी का जन्म 1959 में यज़्द में हुआ। वे शिया धर्मगुरुओं की सर्वोच्च उपाधि ‘अयातुल्लाह’ से सम्मानित हैं, जो ईरान में सुप्रीम लीडर पद के लिए अहम योग्यता मानी जाती है। वे पहले अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रमुख रह चुके हैं और मेयबोद व क़ोम में जुमे की नमाज़ के इमाम की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। 2019 में वे गार्जियन काउंसिल के सदस्य बने। यह संस्था चुनाव उम्मीदवारों की पात्रता तय करती है और संसद द्वारा पारित कानूनों की समीक्षा करती है।
67 वर्षीय अराफ़ी को खामेनेई का करीबी माना जाता है। वे ईरान की धार्मिक शिक्षा व्यवस्था के प्रमुख पदों पर रहे हैं और सांस्कृतिक क्रांति की उच्च परिषद व मदरसा प्रबंधन से भी जुड़े रहे हैं, जिससे उनके प्रशासनिक और धार्मिक अनुभव का अंदाजा मिलता है। 2015 में उन्होंने असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स का चुनाव लड़ा, लेकिन सफल नहीं हुए। हालांकि 2021 में वे इस संस्था के सदस्य चुने गए।
आधुनिक सोच के समर्थक
जहां खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को अपेक्षाकृत परंपरावादी माना जाता है, वहीं अराफ़ी नई तकनीक और आधुनिक साधनों को अपनाने के पक्षधर बताए जाते हैं। उनका मानना है कि धार्मिक संस्थानों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का उपयोग कर इस्लामी सभ्यता को आगे बढ़ाना चाहिए। कुल मिलाकर, अराफ़ी का चयन ईरान में सत्ता के संक्रमण काल का अहम कदम माना जा रहा है, जब तक कि स्थायी सुप्रीम लीडर का औपचारिक चुनाव नहीं हो जाता।