July 17, 2019
ऑफबीट

170 चुनाव हारने वाले पद्मराजन: कलाम, प्रणब, अटल, मनमोहन, जयललिता को दे चुके हैं टक्कर

डेस्क: जीवन में हार मिले तो प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए. जैसा कि डॉ के. पद्मराजन लगातार करते आ रहे हैं. डॉ के. पद्मराजन का नाम पहले भले ही आपने कभी न सुना हो लेकिन यह ऐसा नाम हैं जिसने चुनावों में बड़े बड़े नेताओं के सामने घुटने नहीं टेके!

बतादें कि भारत में चुनाव जीतना और लड़ना एक प्रक्रिया के समान है. लोग देश, समाज, व्यवस्था के बदलाव के लिए चुनाव लड़ते हैं, नेता बनते हैं और ज्यादातर खुद का ही विकास करके निकल जाते हैं. यदा कदा नेता ही होंगे जो अपने पीछे बड़ी संपत्ति न छोड़ कर गये हों… लेकिन ज्यादातर नेता बनते ही लोग अपना विकास करने में जुटे जाते हैं. ऐसे में इस व्यवस्था के खिलाफ तमिलनाडु के सालेम के रहने वाले डॉ के. पद्मराजन लड़ रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वह 170 चुनाव लड़  चुके हैं और सारे चुनाव में उन्हें हार ही मिली है. डॉ के. पद्मराजन 1988 से अब तक चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी है.

अब डॉ के. पद्मराजन का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में ‘भारत के सबसे असफल उम्मीदवार’ के तौर पर दर्ज हो चुका है. वीरप्पन के इलाके से आने वाले डॉ पद्मराजन किसी क्रांतिकारी से कम नहीं हैं तभी तो साठ साल की उम्र में भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ है. डॉ के. पद्मराजन खुद को ऑल इंडिया इलेक्शन किंग कहते हैं. उसका कारण यह है कि उन्होंने क्षेत्रीय, संसदीय चुनाव के साथ साथ राष्ट्रपति के चुनाव में भी भाग लिया और हर बार उनकी जमानत भी जब्त हो गयी. न किसी का डर न किसी का भय किये डॉ के. पद्मराजन लगातार चुनाव मैदान में उतरते आये हैं. इसबार लोकसभा चुनाव में भी वह मैदान में उतरेंगे.

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ डॉ के. पद्मराजन अभी तक अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, एपीजे अब्दुल कलाम, जयललिता और करुणानिधि जैसे बड़े नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं. वहीँ उनके हर बार बिना हो हल्ला के चुनाव मैदान में उतरने का कारण यह बताया जा रहा है कि देश में चुनाव लड़ने की व्यवस्था को आम आदमी से दूर कर दिया गया है.

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देश की सत्ता के लिए वोट डालने वाले आम आदमी ऐसा चुनाव नहीं लड़ पाता है क्योंकि उसके पास ओरों की अपेक्षा इतना धन नहीं होता है. चुनाव में खर्चा करने कि जो होड़ शुरू हुई है वह लगातार आम आदमी को देश की राजनीति और सत्ता से दूर करते जा रही है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह राजनीति सिर्फ धन कुबेरों कठपुतली बन कर रह जायेगी.

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