April 26, 2018
Sampaadakeey Vichaar

यादों में आलोक: सत्यातीत पत्रकारिता: भारतीय संदर्भ

जेआईडेस्क: भारतीय मीडिया पर, मैं अपना दुखड़ा सुनाना शुरू करूँ उससे पहले मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि आज के दौर में विभन्न संस्थानों के पत्रकारों का एक होना और एक साथ एक मंच पर आ पाना असंभव सा लगता है, ऐसा इसलिए क्योंकि जिस दौर की पत्रकारिता और पत्रकार ‘दस जनपथ’ और ‘अशोका रोड की’ ‘जी हुजूरी’ करते हुए जीते हो उस दौर में खासकर सभी को एक कर पाना मुमकिन काम नहीं है. फिर भी कुछ विरले लोग होते हैं जोकि ऐसा माद्दा रखते हैं, लाख भक्ति, कांगी और वामी सोच को रखने वाली पत्रकारिता और पत्रकार होने के बाद भी साल में एक ऐसा मौका आता है जब ‘पत्रकार भी पत्रकार’ की भाषा बोलता है. वह खुद को उस दिन आजाद पत्रकार महसूस करता है, न्यूज़ रूम में बैठकर जिस प्रकार एजेंडा सेटिंग की पत्रकारिता होती है उसका भी वही खुलासा करता है. क्योंकि न्यूज़ रूम से बैठकर पत्रकारिता नहीं होती है, वहां तो सिर्फ कहानियां गढ़ी जाती है.

ऐसे में पत्रकारों को एकसाथ एक मंच पर लाने का काम सुप्रिया रॉय जी करती है. यह सुप्रिया रॉय जी, स्वर्गीय आलोक तोमर की पत्नी हैं. हम उन्ही आलोक तोमर की बात कर रहे हैं जिनके नाम से पत्रकारिता का ‘प’ शुरू होता है. लेकिन दुःख और दुर्भाग्य है यह कि आज वह हमारे बीच नहीं है. और इससे भी ज्यादा दुःख यह है कि अगर आज वह होते तो क्या आज की पत्रकारिता को स्वीकार कर पाते? फिलहाल इस सवाल का जवाब हम नहीं लेकिन वह लोग दे सकते हैं जिन्होंने आलोक जी के साथ काम किया था, जोकि आज भी उनकी याद में मनाये जा रहे (स्मृति) पूण्यतिथि के मौके पर हाजिर होते हैं, और उनके दौर और आज के दौर की पत्रकारी पर चर्चा कर रेखांकित करते हैं कि आज परिस्थितियों के आगे हम कितना असहज हो गये हैं.

24 मार्च 2018 यानी कि शनिवार को श्री आलोक जी याद में दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब में ‘सत्यातीत पत्रकारिता: भारतीय सन्दर्भ’ विषय पर गर्मागर्म चर्चा हुई. देश के जाने माने टीवी और अखबार के पत्रकार दिग्गज लोग एक ही मंच पर मौजूद थे. उन बड़े पत्रकारों को सुनने के लिए मैं भी वहां एक श्रोता के रूप में मैजूद था. मुझे दिल्ली में आये पांच साल हो गया है. इस दौरान मैंने पत्रकारिता का ज्यादा कुछ तो नहीं देखा पर इनता जरुर देखा कि यह राह काँटों ही नहीं बुराइयों, भेदभाव, झूठ, उन्माद, फरेब से भी भरी हुई है. आप जितना सत्य की ओर जाते हैं उतना ही आपका पतन होता जाता है आप जितना झूठ, फरेब और असत्य का साथ देते हैं उतनी ही आपकी तरक्की होती है, ऐसे में कई स्वघोषित पत्रकारों का नाम बता सकता हूँ जिन्हें देखकर आज के दौर में आलोक जी या तो उनकी पत्रकारिता छुडवा देते या खुद पत्रकारिता को त्याग देते? फिर भी आज उनकी अनुपस्थित में देश के बड़े पत्रकारों ने स्टूडियो और दफ्तरों के बाहर वाली पत्रकारिता की बात की, जहन न तो टीआरपी का चक्कर था, न ही बॉस की नजर. सिर्फ बातें थी तो पत्रकार और भारतीय पत्रकारिता की. इस कार्यक्रम को सुनने के बाद एकबात तो साफ़ हो गयी है कि न्यूज़ रूम में पत्रकारिता नहीं हो सकती है और न ही न्यूज़ में कोई पत्रकार बना रह सकता है.

आज उन ही वक्ताओं को आज की पत्रकारिता पर सवाल करते देखा, जिनको लेकर कभी सवाल भी उठ चुके हैं, लेकिन इसमें गलती उनकी ज़रा भी नहीं है. दरअसल आज की पत्रकारिता, पत्रकारिता रही ही नहीं है. जब मीडिया हाउस चलाने वाले मालिक राज्यसभा का गेट निहारते हुए अशोका रोड और दस जनपथ की चौखट पर माथा रगड़ते हों फिर भला क्या पत्रकार और क्या पत्रकारिता. मेरे लिए पत्रकारिता के बिग बी कहे जाने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी ने आज के पत्रकारों और पत्रकारिता कि कलई खोल दी, यह बात अलग है कि न्यूज़ रूम में बैठकर शायद वह भी पत्रकारिता नहीं कर पा रहे थे, इसका सबूत भी उन्होंने दिया कि पहले एडवाइजरी जारी होतो थी, अब सीधा फोन आ जाता है, वह भी पीएमओ और गृहमंत्रालय से, क्योंकि देश की सत्ता और विपक्ष ने सारा जिम्मा आपको (पत्रकारों) को दे दिया है. फिलहाल पत्रकारिता में जिस शब्द विशेष पर चर्चा हो रही थी उसके आज एक दौर में मायने क्या है? और आज उस शब्द के जरिये पत्रकारिता का स्तर कहाँ से कहा आ गया है? ‘सत्यातीत पत्रकारिता’ यानी की सत्य के आगे की पत्रकारिता, कहो तो सत्य के आगे एक एजेंडा है उसे ही सत्यातीत की पत्रकारिता कहते है. मंच पर बैठे कई वक्ताओं ने सत्यातीत की पत्रकारिता पर लम्बे लम्बे भाषण दिए. लेकिन आखिर समस्या जस की तस ही है कि इस पत्रकारिता की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन हैं? क्या मंच पर बैठे लोग यह बात नहीं जानते हैं? (बहुत ही क्रांतिकारी) और (कला केंद्र) की अध्यक्षता करते हुए पत्रकारिता हो पाना तो बड़ा मुश्किल काम है, क्योंकि इसके खिलाफ़ तो आलोक तोमर ही भी हुआ करते थे. लेकिन अब सिर्फ चर्चाएँ हो सकती है? उनपर विचार किया जा सकता है? न कि अमल. क्योंकि दफ्तर और न्यूज़ रूम में जाने से पहले पत्रकारिता को डस्टबिन में डलवा दिया जाता है.

मंच से कई बार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने जिक्र भी किया कि आज के दौर में पत्रकार हो पाना कितना मुश्किल काम है? हालंकि अब इसकी लिए किसको जिम्मेदार माना जाए? पत्रकारों को? पत्रकारिता को? या संस्थानों को जोकि दस जनपथ और अशोका रोड की गुलामी में लगे हुए हैं. इन सब के बीच एक बात तो साफ़ है कि आज के दौर की इस पत्रकारिता को देखकर आलोक तोमर जी पत्रकारिता ही छोड़ देते. क्योंकि आज की पत्रकारिता में निर्भीकता का ‘न’ भी नजर नहीं आता है. आलोक जी की पत्रकारिता के एक नहीं सैकड़ों ऐसे उदाहरण है जिसे पढ़कर जानकार कोई भी उनकी पत्रकारिता को सलाम ही करेगा, यहाँ तक की आलोक जी निर्भीकता के लिए लखनऊ की शकुंतला देवी, यूनिवर्सिटी उनके सम्मान में पुरस्कार देती आ रही है. यह पुरस्कार पिछले दो सालों से दिया जा रहा है. ऐसे में सवाल यह है कि भारत में आखिर पत्रकारिता का स्तर कैसे सुधर सकता है? इसबात को लेकर हर साल चर्चा की जाती है, और यह चर्चा सिर्फ चर्चा ही रह जाती है?

  स्वप्न ठाकुर (ड्रीम)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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