October 23, 2018
Kavita/kahaanee Sampaadakeey

कविता: जमाने की न जाने, ये कैसी बयार है…

बदनाम हस्तियों पर फिल्म बनाने की बॉलीवुड की बढ़ती प्रवृति पर खांटी खड़गपुरिया का प्रहार

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जमाने की न जाने, ये कैसी बयार है…

नेपथ्य में नायक, मगर खलनायकों की बहार है

नाम से ज्यादा बदनामी की पूछ

बजता डंका जोरदार है…

नेक माने जा रहे बेवकूफ

धूर्त – बेईमानों की जय – जयकार है

अग्निपथ पर चलने वाले संघर्षशील कहला रहे बोरिंग

हिस्ट्रीशीटरों की बहार ही बहार है

न जाने कहां रुकेगा ये सिलसिला

सोच कर भी मचता दिल में हाहाकार है…

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Tarkesh Kumar Ojha

Tarkesh Kumar Ojha

यह व्यंग हमें पश्चिम बंगाल के खड़गपुर से तारकेश कुमार ओझा जी ने भेजा है.

(यह लेखक के निजी विचार हो सकते हैं)

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