November 18, 2018
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सुप्रीम कोर्ट में सरकारी नौकरी में पदोन्नति को लेकर हुई सुनवाई

सरकारी नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई . इसी संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्यों न एससी – एसटी के लिए भी क्रीमी लेयर हो ?

बता दें कि क्रीमी लेयर अभी तक ओबीसी वर्ग पर लागू है और यह भारतीय राजनीति में इस्तेमाल किया जाने वाला एक शब्द है जो अन्य पिछड़े वर्गों के अपेक्षाकृत आगे और बेहतर शिक्षित सदस्यों को संदर्भित करता है जो सरकारी प्रायोजित शैक्षणिक और व्यावसायिक लाभ कार्यक्रमों के योग्य नहीं है. साथ ही पी.एस. नरसिम्हा का कहना है की ‘ अनुसूचित जाति का समुदाय आज भी इतना पिछड़ा है कि उस पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता.’

उनका मानना है कि पूरा समुदाय ही आज तक पिछड़ा हुआ है तो समुदाय के कुछ समृद्ध लोगों को आरक्षण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और अन्य पिछड़े वर्गों के मामले में लागू होने वाला सम्पन्न वर्ग का सिद्धांत इन पर लागू नहीं हो सकता. अनुसूचित जाति और जनजातियों को मिलने वाला आरक्षण और दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ इन समुदाय में सम्पन्न तबके की वजह से असली जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रहा है.




इन समुदायों के 95 फीसदी लोग किसी भी प्रकार से लाभ से वंचित रह जाते हैं. बहस के दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा कि जाति का ठप्पा सदियों से एससी- एसटी के साथ रहा है भले ही उनमें से कुछ इससे उबर गए हों. उनका मानना है कि आज भी पूरा समुदाय पिछड़ेपन से जूझ रहा है. साथ ही शीर्ष कानून अधिकारी का कहना है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कुछ वर्ग को बाहर करने का सवाल राष्ट्रपति और संसद द्वारा तय किया जाना चाहिए.

12 साल बाद फिर इस मामले पर सुनवाई हो रही है क्योंकि 2006 के एम नागराज फैसले पर पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि सरकार बिना कोई आंकड़ा जाने एससी-एसटी वर्ग के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण नहीं दे सकती, आरक्षण तभी दिया जा सकता है जब आंकड़ो के आधार पर तय हो कि उनका प्रतिनिधित्व कम है और प्रशासन की मजबूती के लिए ऐसा करना जरूरी है.

राधिका गौतम

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