October 23, 2018
Badi khabren Desh

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे: संघ के संग प्रणब दा

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में आज पहलीबार पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेसी विचारधारा के प्रबल समर्थक माने जाने वाले प्रणब मुखर्जी ने शामिल होकर नया अध्याय लिख दिया है. गुरुवार को प्रणब दा नागपुर मुख्यालय पहुंचे जहाँ उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की.

बतादें कि गुरुवार को पूर्व राष्ट्रपति और दिग्गज कांग्रेसी प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय नागपुर पहुंच कर आरएसएस के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की. इस दौरान उन्होंने विजिटर बुक में पूज्यनीय हेडगेवार जी को माँ भारती का सपूत कहा.

उन्होंने लिखा कि आज हम माँ भारती के सपूत को श्रद्धांजलि देने के लिए यहाँ आये हैं. वहीँ उसके बाद उन्होंने आरएसएस की तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि, भारत में राष्ट्रीयता एक भाषा और एक धर्म की नहीं है. प्रणब दा आगे ने कहा कि भारत की ताकत उसकी सहिष्णुता में निहित है और देश में विविधता की पूजा की जाती है.

लिहाजा देश में यदि किसी धर्म विशेष, प्रांत विशेष, नफरत और असहिष्णुता के सहारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने की कोशिश की जाएगी तो इससे हमारी राष्ट्रीय छवि धूमिल हो जाएगी. इसके बाद उन्होंने कुछ शब्दों पर जोर देकर कहा कि, ‘वह इस मंच से राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर अपना मत रखने के लिए बुलाए गए हैं. इन तीनों शब्दों को अलग-अलग देखना संभव नहीं है. इन शब्दों के समझने के लिए पहले हमें शब्दकोष की परिभाषा देखने की जरूरत है.

बीस मिनट से ज्यादा की स्पीच में उन्होंने भारत की एकता, अखंडता को एलकार तमाम बातें कहीं. जोकि बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए अहम् थीं. प्रणब दा मंच से न तो किसी दल के लिए बोल रहे थे न किसी समुदाय के लिए उनका लक्ष्य भारत की तरक्की, एकता और विकास को लेकर था. प्रणब दा ने कहा कि आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को देश ने अपने लिए नया संविधान अंगीकृत किया. इस संविधान ने देश को एक लोकतंत्र के तौर पर आगे बढ़ाने की कवायद की.

शिक्षा वर्ग को संबोधित करते हुए प्रणब दा  ने कहा कि, वह शांति का प्रयास करें और जिन आदर्शों पर नेहरू और गांधी जैसे नेताओं ने राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देशभक्ति की परिभाषा दी उन्हीं रास्तों पर चलते हुए देश की विविधता को एक सूत्र में पिरोने का काम करें. उनके कहने के कई तात्पर्य निकाले जा रहे हैं. जहाँ एक ओर आज का कथित और उग्र राष्ट्रवाद वहीँ नेहरु गांधी का राष्ट्रवाद. युवाओं को तय करना है कि वह किस राष्ट्रवाद पर चलना चाहते हैं.

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