November 15, 2018
Vichaar

सह लिए तो सही, नहीं तो नालायक …!!

जी  हां … यह हर उस संवेदनशील व्यक्ति की विडंबना है जो गलत होते देख नहीं पाता. लेकिन मुश्किल यह कि विरोध करना भी  हर किसी के बूते की बात नहीं. क्योंकि समाज का सीधा  नियम है कि सह लिया तो सही नहीं तो नालायक….  बाल विवाह और मृत्युभोज समेत तमाम ऐसी सामाजिक बुराइयां थी, जिन्हें देख कर बचपन का बाल मन विचलित हो उठता  था.

मन के किसी कोने में आवाज उठती कि यह गलत है. लेकिन मुश्किल यह कि स्वीकार न करने के बावजूद सीधे तौर पर इससे इन्कार करना भी मुश्किल था. क्योंकि स्थापित सामाजिक परंपराओं को आंख मूंद कर स्वीकार करने वालों को तब प्रशंसा मिलती थी, और नकारने वालों को तत्काल नालायक की उपाधि से विभूषित कर दिया जाता था. कदम – कदम पर जलील होने का खतरा ऐसे लोगों के सिर पर हमेशा मंडराता रहता था. किशोर उम्र तक न चाहते हुए भी अनेक बाबाओं के संपर्क में आना पड़ा. क्योंकि अक्सर शहर में कोई न कोई बाबा आते ही रहते थे. परलोक सुधारने की चिंता में दुबले होने वाले हमारे अभिभावक हमें उलाहना देते हुए जबरदस्ती वहां भेजते थे कि जाकर कुछ समय सत्संग में बिता नालायक… क्या पता बाबा के चमत्कार से ही तेरा कुछ भला हो जाए. बाबाओं की बातें तब भी अपने गले नहीं उतरती थी. न उनकी बातों को स्वीकार करने को जी चाहता था. लेकिन फिर वहां नालायक करार दिए जाने का डर …. कॉलेज तक पहुंचते – पहुंचते देश के कई राज्यों में अलगाववादी आंदोलन का भयावह दौर शुरू हो चुका था. तब समाचार पत्रों की सुर्खियों में ही अमुक राज्य में आतंकवादियों ने इतनों को मौत के घाट उतारा  जैसी खबरें अमूमन रोज छपी मिलती थी, जिन्हें देखते – पढ़ते मन विचलित हो जाता . तब भी जेहन में सवाल उठता कि क्या कोई राज्य अपनी छोटी सी सीमा में अपना अस्तित्व बचा सकता है.

फिर ऐसा हिंसक आंदोलन क्यों हो रहा है. इससे अलगाववादियों को भला क्या हासिल होगा… अपनी मांग मनवाने के लिए निर्दोष लोगों की हत्याएं क्यों की जा रही है. मांगें मनवाने का यह आखिर कौन सा तरीका है.  फिर मन चीत्कार कर उठता…  निरपराध मारे जा रहे लोगों की जान बचाने को सरकार इनकी मांगे मांग क्यों नहीं लेती. जो साथ रहना नहीं चाहते उन्हें आखिरकार समझा – बुझा कर कितने दिन साथ रखा जा सकता है.  यह कैसी विडंबना है कि मांगें किसी की लेकिन  बलि किसी और की चढ़ाई जा रही है. लेकिन फिर यह सोच कर मन मसोस लेना पड़ता था कि ऐसी बातें कहने – सोचने से मुझे फौरन देशद्रोही घोषित किया जा सकता है. दुनिया में और भी कई चीजें हैं जिन्हें स्वीकार करने को जी नहीं चाहता. लेकिन किया भी क्या  जा सकता है. मेरे शहर में एक नामी शिक्षण सस्थान है. जहां अक्सर तरह – तरह के सभा – समारोह होते रहते हैं. जिन्हें देख कर खासा कौतूहल होता है क्योंकि अपन ने जिस स्कूल से पढ़ाई की , वहां 15 अगस्त और 26 जनवरी को भी एक चालकेट नसीब नहीं होती थी और यहां पढ़ाई के नाम पर इतना ताम – झाम.

शिक्षांगन का उत्सवी माहौल मन को सुकून देता है कि चलो खुद चाहे बगैर चप्पल के स्कूल – टयूशन जाया करते थे, लेकिन नई पीढ़ी कितनी सुविधाओं  से लैस है. लेकिन समस्या इसके समारोहों में माननीयों की गरिमामय उपस्थिति से होती है. क्योंकि इस दौरान लगातार कई दिनों तक शहर का जनजीवन अस्त – व्यस्त बना रहता है. सुरक्षा के लिए जगह – जगह बैरीकेड और नाकेबंदी तक भी ठीक है. लेकिन परेशानी माननीयों को परेशानी न हो, इसके लिए सड़कों पर  स्पीड ब्रेकर तोड़े जाने से होती है. जो वैसे ही बड़ी मुश्किल से बन पाते हैं. तोड़े जाने के बाद इनके बनने का लंबा इंतजार. स्पीड ब्रेकर यानी आम लोगों का हादसों से बचाव का बड़ा भरोसा जो बना ही मुश्किल से था. काफिले के लिए टूट गया. यह सब देख मन में सवाल उठता है कि क्या शिक्षण संस्थानों के समारोहों में इतना तामझाम जरूरी है. क्या यह सादगी से नहीं किया जा सकता. फिर सोच में पड़ जाता हूं कि देश में न जाने कितने इस तरह के संस्थान होंगे. सभी जगह यह सब होता होगा.  आखिर इस मद में कितना खर्च होता होगा. फिर सोचता हूं कहीं मुझे गलत न समझ लिया जाए क्योंकि…

 

तारकेश कुमार ओझा 

Tarkesh Kumar Ojha

    Tarkesh Ojha

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

(यह लेखक के निजी विचार हो सकते हैं.)

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