November 17, 2018
Kavita/kahaanee

कविता: मेरे गांव की गलियां…

कविता: मेरे गांव की गलियां…

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मेरे गांव की गलियां…

सुना है बेड़ियों में जकड़ गई हैं गांव की हंसती खेलती गलियां

अब तो सुना है दो धड़ों में बंट गई हैं गांव की गलियां

अब वो बात नहीं जब नंग धड़ंग पायल बंधी गलियों में दौड़ती थीं एड़ियाँ

अब वो बात नहीं जब गांव के लोगों के चलने से खिलखिलाती थी कलियां

अब तो सुनाई देती हैं मन की लोगों के अंदर की नफरत द्वेष की गालियां

पता नहीं किस शत्रु ने छीन ली मेरे गांव की खुशियां

अब तो गांव की गलियों में पलती हैं गलतफहमियां

सुना है जिस गली में तुम गिर के उठे थे उससे दूर चले गए हो

शायद तुम अपनी बचपन की गलियों को भूल गए हो

सुना है तुम हर किसी की खबर रखते हो

क्या तुम्हे तुम्हारे गांव का इल्म नहीं

कि तुम्हारे गांव की गलियों ने कितना जुल्म सहीं

आज मैं तुम्हे जगाने के लिए अपने आंगन में बुलाई हूं

सौ बातों की एक बताने के लिए तुम्हे उठाई हूं

आज तुम आवाज अपनी प्रखर कर दो

फिर प्रेम सदभावना का शिखर बना दो

आपसी भाईचारा का एक प्रहर बना दो

द्वेष की भावना का संहार कर दो

तुम पत्रकार हो भारती के सपूत दुलारे

आज वीरता की रसधार बहा दो

ताकि गांव की गलियां चहक उठें

Bhaskar Tiwari

   Bhaskar Tiwari

गांव फिर खुशियों से झूम उठें.

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यह कविता हमें नॉएडा, उत्तर प्रदेश से भास्कर तिवारी जी ने भेजा है.

(यह लेखक के निजी विचार हो सकते हैं)

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