April 26, 2018
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जमीनी स्तर पर खरा उतर पाएगा किसानों के लिए मोदी का बजट

आशु कुमार दास

बजट 2018 के संसद में पेश होने तक देश के हर वर्ग को उम्मीद थी कि उसे कुछ मिलेगा. उसके जीवन में जो समस्याएं थी उनका समाधान अरूण जेटली की पोटली से निकलेगा. बजट में किसे क्या और क्यों मिला इस पर बहस करने से अच्छा है कि बजट के मकसद पर गहन अध्ययन करना. मोदी सरकार के आखिरी बजट का जरूरी मकसद सामाजिक समानता को बढ़ावा देना था, यह जरूरत तभी पूरी हो सकती थी जब सरकार वचिंत वर्ग के लिए कुछ खास करने की उम्मीद जगाती. वचिंत वर्ग यानि की किसान, गांव में रहने वाला हर वो नागरिक जो अपनी परंपरा को संजोय हुए है. किसानों और ग्रामीणों के बाद दूसरा वंचित वर्ग आता है वो है महिलाएं. पिछले कई सारे बजट हो या फिर ये बजट महिलाओं और किसानों का जिक्र धड़ल्ले से किया जाता है.

केंद्र की सत्तासीन सरकार हर बार दावा करती है कि वो इन दोनों के लिए कुछ ना कुछ खास जरूर करेगी. इन्हीं दोनों वर्गों के लिए लाभकारी बताकर बजट भी पेश किया जाता है. इस बजट में भी कुछ ऐसा ही हुआ. संसद में जैसे ही जेटली ने किसान हित बताकर बजट को पढ़ना शुरू किया, चारों ओर हंगामा शुरू हो गया. मीडिया हो या सोशल मीडिया हर जगह एक ही बात थी कि रबी की फसल पर वायदे के अनुसार लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया जा रहा है और इसी तर्ज पर अब खरीफ की फसल पर दिया जाएगा, लेकिन कैसे? जो वायदे  पहले पूरे नहीं हुए अब पूरे कैसे होंगे. मीडिया में बहस इस बात पर थी कि किसान की उपज पर लागत का आकलन सही नहीं है. देश का गरीब किसान पहले ही ये बात कहता आ रहा है. किसानों के मन में आज भी विलाप है कि अपनी उपज लागत से उसे कम दाम पर अपनी फसल को बेचना पड़ता है, क्योंकि ऐसा नहीं करेगा तो पेट पालने की उसकी आखिरी उम्मीद भी दम तोड़ देगी.

किसानों के लिए कर्ज़ की सुविधा का ऐलान

पहला समर्थन मूल्य दूसरा सबसे बड़ा ऐलान किसानों को 11 लाख करोड़ रुपये का कर्ज देने का था. किसानों को कर्ज देना किसी पहाड़ को तोडने के बराबर माना जाता है, क्योंकि देश का किसान खुद कर्ज की मांग कर रहा है ये बात जितनी उसकी समझ से बाहर है उतनी ही सरकार के लिए भी. सरकार सिर्फ बैंकों के जरिए ही किसानों को ऋण उपलब्ध करवा सकती है, जो ज्यादातर मामलों में संभंव नहीं हो पाता है. अंतत: किसान को साहूकार से मोटे ब्याज दर पर ऋण लेना होता है. कर्ज किसान की आवश्यकता नहीं है. किसान की अकेली आवश्यकता उसके उत्पाद के सही दाम मिलना है. अन्न दाता को सही दाम मिलेंगे तो वो ना तो कर्ज लेगा और ना ही गरीब होगा.

कृषि बाजार के आधारभूत ढांचे की फिक्र

पूरे बजट में सही मायने में अगर किसान के काम की कोई बात रही तो वह थी कृषि बाजार और आधारभूत ढांचा बनाने या बढ़ाने का ज़िक्र. बजट 2018 में तकरीबन 22,000 ऐसी इकाइयों के निर्माण करने की योजना है और भी कई कामों की सराहना है. हालांकि इस योजना के आधारभूत ढांचे में कब, कैसे कितना बदलाव आता है ये वक्त बताएगा. फिलहाल सरकार के सामने किसानों को कर्ज देने की चुनौती नहीं है बल्कि उसकी मेहनत का फल देने की है. किसानों को ही इस तरह के उद्योग में लाने की शुरुआत होती तो बेशक बहुत बड़ी पहल होती, लेकिन मुश्किल यह है कि किसान जब अपने लिए सबसे माफिक उद्यम में ही घाटा उठा रहा है तो उद्यम बदलने का जोखिम उठाने की तो वह कल्पना ही नहीं कर सकता.

आशु कुमार दास

Note- (यह लेखक के निजी विचार हैं)

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