April 26, 2018
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विश्व हिंदी दिवस: मातृभाषा के  इंग्लिश मीडियम बच्चे!

सिर पर साफा और सम्पूर्ण खादी के वस्त्र, हवाई चप्पल मतलब पूरे गाँव वाले का हुलिया बनाये एक अधेड़ जिसे हम ‘देहाती’ भी कह सकते हैं. भोर होते ही दरवाजे पर आ धमके और मैं आँखे मूंदे, कभी मिलमिलाते हुए, गोंणा (जानवर बाँधने की जगह) से नीम की दातून तोड़ने के लिए जा रहा था, एक नजर हमने उनकी और गर्दन घुमा के देखा चलते चलते. सोचा कि होगा कोई पड़ोस गाँव का, पिता जी से मिलने या किसी काम से आया होगा.

अब तक मैं नीम की टहनी पकड़ पूरा लटककर दातुन तोड़ लिए थे. मुंह में नीम की टहनी की दातुन करते करते मैं वापस हुआ तो दरवाजे की ओर देखा कि वह शख्स हमको बड़ा टकटकी लगाकर देख रहे थे. हमने पास पहुँच कर मुंह में दातुन दवाये हुए पूछा, काहे ताऊ क्या लेने आये हो, कौन गाँव से हो, इतना पूछते ही जनाव ने मेरी ओर थोड़ा आँखे टेड़ी-मेड़ी की और सिर झुकाते हुए चश्मा नाक पर करके गौर से देखा और बोले पहचाना नहीं, हम हैं तुम्हारे गुरु जी सरस्वती शिशु मंदिर, हिंदी वाले, चम्पक लाल (नाम बदला हुआ है). इतना सुनते ही मेरे होश उड़ गए आज के करीब बारह साल पहले इनको आखिरी बार देखा था. मैंने झुकते हुए पैर छुए, कहा गुरु जी आप कैसे हैं? काफी दिनों बाद देखा है आपको और आपने तो अपना भेष ही बदल लिया है.

मास्टर जी तपाक से बोले भेष कहां बदल लिया. हम तो पहले भी ऐसे ही थे और आज तो हिंदी दिवस है इसलिए लाल बहादुर शास्त्री भेष में हिन्दीमय हूँ, तब जाकर हमे भी ध्यान आया कि आज विश्व हिंदी दिवस. वही हिंदी जिसका ‘अ’ बनाने के लिए हमारी माँ कहती थी पहले एक चूल्हा बनाओ फिर उसी में दुसरा चूल्हा जोड़ दो तब जाकर हमने कहीं हिंदी का पहला अक्षर ‘अ’ सीखा था जिस हिंदी के माध्यम से पहले माँ-बाप, समाज, पढ़ाई, लिखाई, दुनिया देखी और यहां तक पहुंचा हूँ. आज उसी हिन्दी दिवस पर हमें हमारे गुरु जी आकर बताते हैं कि आज हिंदी का विश्व हिंदी दिवस है. इतना सब कुछ सोच ही रहे थे कि मास्टर जी बोल पड़े और कैसे हो? क्या दिल्ली में ही रहने लहे हो. मैं इस सब की सोच से अभी तक बाहर नहीं निकल पाया था.

अचानक उनके सवाल से चौंक गया. हमने अनबने मन से ‘Yes-Yes’ का जबाव दे दिया मास्टर जी बोले अब तो मातृभाषा के बच्चे भी इंग्लिश मीडियम वाले होते जा रहे हैं. शायद मास्टर जी हमारे उत्तर से संतुष्ट नहीं थे. मैंने उनको चारपाई डालते हुए बैठने को कहा, मास्टर जी अपना थैला चारपाई के सिरहाने रखते हुए बैठ गए, हमे भी इशारा कर दिया बैठने को, तो मैं भी एक ओर बैठ गया. मास्टर जी बोले तुम तो सिर्फ पढ़ने के लिए दिल्ली गए थे लेकिन अब वहीँ के होना चाहते हो. अच्छा वहां तो अभी हिंदी ही बोली जाती होगी, या इंग्लिश वाली पीढ़ी आ गयी है. मैंने कहा मास्टर जी हिंदी ही बोली जाती. इतने में मास्टर जी बोल पड़े नई पीढ़ी के बच्चे तो इंग्लिश ही बोलते होंगे. मैंने जबाव दिया, हाँ नई पीढ़ी इंग्लिश की ओर रुख ज्यादा करती है. इतना सुनकर मास्टर जी बोलने लगे अरे बेटा धीरे धीरे हिंदी मिटती जा रही है.

वह तो परदेश है यहाँ अपने गाँव में हिंदी ढलान पर है, साथ ही मेरा उदहारण देते हुए कहा अब तो बच्चों को घर-घर जाकर बताना पड़ता है, कि आज हिंदी दिवस है. मैंने उनकी बात पर बनावटी मुस्कान छोड़ते हुए कहा, अरे मास्टर जी ऐसा कुछ नहीं है. हिंदीं हमेशा हमारी मातृ भाषा रहेगी. दरअशल भाग दौड़ में भूल गया कि आज हिंदी दिवस है. मास्टर जी मेरा जबाव सुनकर बोले, अपना जन्मदिन भूले कभी, माँ बाप को भूले कभी, मैंने ‘न’ में सिर हिला दिया. तो हिंदी को कैसे भूल सकते हो? वह भी हमारी माँ के समान है. यह लेख 15 सितंबर 2014 को लिखा था हिंदी दिवस के एक दिन बाद. वाकई आज हमारे जैसा हाल बहुतों का है हम पर किसी एक भाषा ने अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया है, जिसके चलते हिंदी भाषा, मातृ भाषा से नाममात्र की भाषा रह गयी है. 14 सितंबर को हिंदी दिवस होता है और 14 फ़रवरी को वेलेनटाईनडे. अगर भारत के किसी बच्चे, युवा, बुजुर्ग से पूछा जाए कि हिंदी दिवस कब होता है तो शायद कम ही लोग बता पाएंगे लेकिन वेलेनटाईनडे की तारीख़ हर किसी को पता होती है. दूसरों का क्या कहूँ यह तो मेरी ही हालत है.

हमारी नजऱंदाजियां आने वाली पीढ़ी हिंदी को और हमसे दूर कर देगी, अगर अभी भी हमने इस पर विचार न किया तो. देश में 14 सितम्बर को मनाया जाता है. 14 सितंबर 1949 को देश की संविधान सभा ने एक मत में यह निर्णय लिया था कि हिन्दी भाषा ही भारत की राजभाषा होगी. इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद से और हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है. वहीँ विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है. विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं. विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित करने के लिए पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था. भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी.

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