April 26, 2018
Sampaadakeey Vichaar

साहब हमें ऐसी मौत मरना अच्छा लगता है!

भारत एक ऐसा देश है जहाँ घटना के बाद तमाम तरह के नियम कायदे, कानून बनाकर उनके पालन करने की बातें और हवाला दिया जाने लगता है लेकिन हम इतने ढीठ हो चुके हैं कि हर बार नुकसान उठाकर भी सुधरने का नाम नहीं लेते है. अब दिल्ली के बवाना क्षेत्र में लगी भीषण आग को ही ले लो. क्या यह कोई पहली घटना है या आखिरी? सवाल यह है कि पिछली साल ही नॉएडा की एक कंपनी में ऎसी ही भीषण आग लगी थी. जिसमें कई लोगों की जलकर मौत हो गयी थी. ठीक वैसा ही वाक्या दिल्ली के बवाना क्षेत्र में स्थित औधोगिक इकाई में हुआ. जहाँ प्लास्टिक की फैक्ट्री में आग लगने से 17 लोगों की जलकर मौत हो गयी. दूर–दराज से रोटी कपड़ा और मकान के लिए मेहनत मजदूरी करने आये मजदूरों की मौत पर दो-चार दिन तक बातचीत और मीडिया ट्रायल होगा. उसके बाद कौन मरा? क्यों मरा? और कैसे मरा से किसी को कोई मतलब नहीं रहेगा. क्योंकि हम भारतीय गलतियों से सबक लेते ही नहीं हैं. हमे तो सिर्फ गलतियाँ करके नुकसान उठाने के लिए ही बनाया गया है. जनता के साथ साथ हमारा सिस्टम भी कुछ ऐसा ही है. क्या प्रशासन क्या सरकार अब के सब नकारा. अरे नहीं भाई नकारा वह नहीं है नकारा तो जनता है जो हर जगह समझौते करके काम करने को आतुर रहती है. बेरोजगारी का आलम यह है कि एक लाख बोल्टेज वाली बिजली लाइन पर भी किसी को चढ़ने के लिए बोल दो तो वह भी नौकरी का हवाला देकर चढ़ के जान दे देगा. अब इसमें सरकार या प्रशासन कहाँ से बीच में आ गया. जनता तो मरने के लिए ही पैदा होती है. फिर चाहे मुंबई के रेलवे पुल में भगदड़ से मरे या बवाना की प्लास्टिक फैक्ट्री में जल कर मरे. मरना तो है ही अगर यहाँ भी न मर सके तो भात-भात कहते हुए मर जाना है. जनता पैदा ही होती है मरने के लिए, तो उसके मरने या जीने से किसी को क्या फर्क पड़ेगा? क्योंकि जनता अपनी गलतियों से सीखना ही नहीं चाहती है. उसे सीखने कहीं जयादा मर जाना अच्छा लगता है.

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Journalist India