October 24, 2018
Shiksha Vichaar

स्कूली शिक्षा में भूटान की अनोखी पहचान

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे में था उन दिनों. जी हजूरी और गलत बात देख कर भी चुप रहने की कला कभी सीख ही नहीं पाए और एक सेमीनार में बोलते हुए 2002 के गुजरात दंगों पर बेलाग टिप्पणी कर थी. उसी का नतीजा थी यह ‘काले पानी’ की सजा. मेरे लिए तो लेकिन यह पुरस्कार से कम नहीं थी अपने यायावरी मिजाज़ के चलते. पडोसी देश भूटान जाने का भी मौका मिला एक निरीक्षण दौरे के दौरान. तभी वहां की शिक्षण प्रणाली को नजदीक से जाना,पहचाना!

अगर मैं कहूं कि जो हालत अपने यहां के गांव देहात के सरकारी स्कूलों की है, लगभग वैसी ही हालत है भूटान के प्राइवेट स्कूलों की तो क्या आप मान लेंगे. मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता. लेकिन सचमुच ऐसा ही है, निजी स्कूल तो वहां पढ़ाई में उन कमजोर बच्चों के लिए होते हैं जिन्हें सरकारी स्कूलों में दाखला नसीब नहीं होता. कोई स्टेट्स सिंबल नहीं है निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना. स्थानीय और अंग्रेज़ी दोनों में दी जाने वाली स्कूली शिक्षा भूटान में पूरी तरह निःशुल्क है.

एक लंबे समय से वकालत करता आ रहा हूं ऐसी स्कूली शिक्षण व्यवस्था की जिसमें मंत्री से लेकर संतरी तक, मंत्रालय/विभाग के सचिव से लेकर चपरासी तक, सभी लोगों के बच्चों की पढ़ाई सरकारी स्कूलों में करवाना अनिवार्य हो अनेक देशों में अनिवार्य फौजी सेवा की तरह! फिर देखिए जादू कैसे सर चढ़ कर बोलता है!

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुछ साल पहले इसी आशय का एक फैसला दिया भी था जो पता नहीं कहां धूल चाट रहा होगा! अपनी इसी इच्छा का मूर्त रूप देखा हमने भूटान के स्कूलों में जहां के स्कूलों की स्थिति 1980 से पहले तक तो हमसे भी कहीं बुरी थी. तभी भूटान के वर्तमान राजा जिग्मे वांगचुक को वहां के तत्कालीन राजा ने प्रायोगिक आधार पर सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलाया. इस एक बात का जो परिणाम सामने आया, वही भूटान की मौजूदा शिक्षा नीति का आधार बना. अरुण राजपुरोहित साहब ने बदलाव की इसी प्रक्रिया का बहुत सुंदर विवरण दिया है:

“राजकुमार के स्कूल में प्रविष्ट होते ही सुस्त पड़ा स्कूल प्रशासन अचानक अलर्ट मोड पर आ गया. किसी भी अध्यापक की क्या मजाल जो जरा सा भी लेट हो जाए या क्लास बंक कर दे. अपने बेटे की पढ़ाई के लिए ही जब राजा को कई बार स्कूल जाना पड़ा तो वहाँ की सारी कमियाँ एक-एक कर उनके सामने आने लगी. बिल्डिंग, फर्नीचर से लेकर किताबों तक सब पर ध्यान गया. उधार की किताबों का मोह छोड़ विदेशों से विभिन्न शिक्षाविदों को आमंत्रित कर भूटान देश की संस्कृति और सभ्यता के अनुरूप नए पाठ्यक्रम का खाका तैयार हुआ. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भूटानी छात्र मुकाबला कर पाएं इसके लिए शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखा गया, हालांकि स्थानीय भाषा में शिक्षा का विकल्प भी उपलब्ध है.



बरसों से अलसाए शिक्षा विभाग को तरोताज़ा रखने के लिए निरन्तर सामयिक प्रशिक्षण सत्र होने लगे. जब परिणाम कुछ सकारात्मक दिखाई दिए तो सभी राजकीय कार्मिकों की संतानों के लिए राजकीय विद्यालयों में शिक्षा को विधिक रूप से अनिवार्य बना दिया गया. उसका परिणाम यह हुआ है कि आज भूटान के राजकीय विद्यालय एक आदर्श की तरह उभरे हैं.”

शेष कल…

गुरचरण सिंह की फेसबुक वॉल से.

(यह लेखक के निजी विचार हो सकते हैं)

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